शांताराम और सुजाता अनेकों बार बेटी का रिश्ता टूट जाने की पीड़ा से गुजरे हैं। पर आज निर्मला के खुद रिश्ता ठुकरा देने पर बहुत खुश हुए। समय पर सच्चाई पता चल गयी। नहीं तो बेटी का जीवन कष्टों से भर जाता। ऐसे झूठे लोगों से तो भगवान ही बचाये।

   खुशी के साथ मन में एक पीड़ा भी थी। उन्हें लगा कि वह अपना कर्तव्य सही तरह से निभा नहीं पाये। उन्हें अच्छी तरह जांच पड़ताल कर फिर रिश्ता पक्का करना चाहिये था। लडके की पढाई के कागजात तो देखने ही चाहिये थे। कुछ दूसरे लोगों से भी इस विषय में पता करना चाहिये था। भले ही अच्छाइयां छिपी रहें पर बुराइयां तो जगजाहिर होती हैं। यदि पता करते तो अनुराग की दुश्चरित्रा आसानी से पता चल जाती। लड़की के पिता तो दूसरे शहरों में लड़कों के ऐब पता कर लाते हैं। पर दुखद बात है कि हम अपने ही शहर में जानकारी नहीं कर पाये।लगता है कि यह बात झूठ है कि हम बेटी के माता पिता के कठिन कर्तव्य का पालन करने की इच्छा रखते हैं। बेटी का कन्यादान कर दिखाना चाहते हैं कि एक बेटी के पिता की बराबरी कोई नहीं कर सकता है। लगता तो यही है कि हमारी गुणवती बेटी भी हमें बोझ लगने लगी है। तभी तो बिना जानकरी किये बोझ को उतारने की तैयारी कर ली। ईश्वर हमें माफ करें तथा हमें राह दिखायें। हर पाप का कोई न कोई प्रायश्चित होता है। हमारे अपराध का भी कोई निदान होगा। हम खुशी खुशी वह दंड स्वीकार कर लेंगें। बस हमारी गुणी बेटी के जीवन पथ का कोई गुणी साथी उसे दिला दो। हमारे अपराध का दंड हमारी बेटी को न दो। 

   निर्मला अपने माता पिता के चेहरे पर खुशी को देख रही थी। वह यह भी देख रही थी कि किस तरह उसके माता पिता ने उसके निर्णय में उसका साथ दिया है। वैसे डाक्टर साहब ने बात साधने की बहुत कोशिश भी की। पर शांताराम जी का निश्चय अविचल रहा। साथ ही निर्मला वह भी देख रही थी जो कोई और नहीं देख पा रहा था। अपने माता पिता के मन में छिपी उदासी निर्मला से छिपी नहीं रही। 

   वह शाम कुछ ज्यादा ही रौनक थी। अभी अभी बारिश बंद हुई थी। गमलों में लगे पौधे ज्यादा ही हरे दिखने लगे। आसमान में इंद्रधनुषी छटा थी और धरा पर वह माहौल जब एक बेटी अपने माता पिता के अंतर्मन की पीड़ा को नष्ट करने का प्रयास कर सकती है। 

  " आज सुबह कितनी गर्मी थी। अब देखो कितना सुहाना मौसम हो गया है।" 

  " हाॅ बेटी। कुछ दिनों से भगवान सूर्य नारायण ज्यादा ही नाराज थे। अपनी प्रचंड गर्मी से जग को गर्मा रहे थे।" शांताराम ने उत्तर दिया। पिता और पुत्री दोनों आसमान में छाये इंद्रधनुष को निहारने लगे। 

" वैसे पिता जी। सच्चाई तो यही है कि जो बारिश अभी हुई है, उसका कारण भी तो भगवान सूर्य ही हैं। यदि भगवान सूर्य इतना गर्म न होते तो सागर का जल कैसे बादल बनता। कैसे बारिश होती। भगवान सूर्य को दोष देते देते हम भूल ही जाते हैं कि वह तो हमारे हित का ही कर रहे हैं। यदि गर्मी नहीं सहन करेंगें तो बारिश भी भला कैसे होगी। "

" यह बिल्कुल सही है बेटी। " अभी तक शांताराम को निर्मला की पूरी बात समझ नहीं आयी थी। तभी निर्मला अपने पिता के कंधे से लग गयी। शांताराम अब समझ गये। जरा सी देर में बेटी ने उन्हें सब समझा दिया। कभी संसार की घटनाओं को दिखाकर बेटी को अध्यात्म की बात समझाते थे। आज बेटी भी वही कर रही है। ईश्वर का हर विधान मंगल के लिये ही होता है। 

   " हाॅ। तुम सही कह रही हो बेटी। भगवान सूर्य तो संसार का हित ही चाहते हैं। फिर संसार के हित के लिये कुछ परेशानी तो सहन करनी ही चाहिये।" 

  " फिर मुझे तो यह भी लगता है कि संसार का हित ही प्रमुख है। ईश्वर सभी की किस्मत अलग अलग बनाते हैं तो इसमें भी संसार का ही हित है। यदि सभी को एक सा बना दें तो शायद ही संसार खुशहाली की राह पर चल पायेगा। लगता है कि किस्मत को दोष देना बेकार है। लगता है कि यह जानना ज्यादा जरूरी है कि ईश्वर ने किस से क्या चाहते हैं। अनेकों बार किसी से ईश्वर कुछ अलग ही चाहते हैं। तो पापा। यह कोई दुखी होने की बात तो नहीं है। यह तो प्रसन्नता का ही विंंषय हुआ। इससे तो उसकी विशिष्टता ही समझ आती है। इतने लोगो में ईश्वर ने उस विशिष्ट को विशिष्ट काम के लिये चुना है। "

" हाॅ बेटी। तुम्हारी बात सर्वथा सत्य है। पर वास्तव में मनुष्य इसे समझ नहीं पाता। " भावनाओं में शांताराम ने निर्मला के सर पर हाथ रख दिया। निर्मला के निर्णय को मौन स्वीकृति दे दी। फिर भी मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि है संसार के रचयिता। निश्चित ही आपने मुझे एक विशिष्ट बेटी दी है। आपकी इच्छा मेरी विशिष्ट बेटी से विशिष्ट कार्य कराना ही है। पर दूसरी तरफ आपने मुझे भी कुछ विशिष्ट बनाया है। मुझे बेटी का पिता बनाया है। बेटी का पिता बनना बड़े सौभाग्य की बात है। अनेकों लोग तो कन्या दान का पुण्य भी नहीं पा पाते। अब जो करना है, आप को ही करना है। आपसे यही प्रार्थना करता हूं कि मेरी विशिष्ट बेटी के अनुरूप कोई विशिष्ट वर आप ही उपलब्ध करायें। अभी भी यही चाहता हूं कि मुझे कन्या दान के अधिकार से बंचित न किया जाये। पर यह तो मेरी प्रार्थना मात्र है। आपके हर विधान में मंगल ही मंगल है। 

   कहा जाता है कि ईश्वर सच्चे मन की प्रार्थना अवश्य सुनते हैं। उससे भी अधिक वह खुद के विधान के लिये खुद मार्ग निकालते हैं। वैसे तो निर्मला को डाक्टर रजनी के अस्पताल में काम करने में कोई दिक्कत नहीं है। डाक्टर रजनी भी उसे बहुत मान देती हैं। उसकी सहेली मीना भी साथ है। पर जिस दिन निर्मला ने अखबार में श्री राम कृष्ण परमहंस अस्पताल, वृन्दावन के लिये स्त्री रोग विशेषज्ञ की आवश्यकता का विज्ञापन पढा, उसे लगा कि शायद यही उसकी राह है। भगवान श्री कृष्ण की लीला स्थली का वास और गरीबों की सेवा का अवसर बहुत कठिनाई से मिलता है। वैसे माता पिता से दूर जाने से उन्हे तकलीफ तो होगी। पर अब जीवन को नयी दिशा देनी है। मम्मी और पापा भी मुझसे मिलने के बहाने पवित्र धाम आते रहेंगे तो उनका मन भी बदलने लगेगा। 

   शांताराम और सुजाता जी का मन तो नहीं था कि बेटी दूर जाये। पर बेटी की खुशी के लिये उसे आज्ञा दे दी। निर्मला ने पत्र लिखकर अपनी इच्छा, सारे प्रमाणपत्र की प्रतियां और अनुभव के साक्ष्य भेज दिये। कुछ ही दिनों बाद श्री राम कृष्ण परमहंस अस्पताल, वृन्दावन से उसके लिये बुलावा आ गया। निर्मला अपने जीवन को नयी राह देने के लिये वृन्दावन चल दी। लगता है कि निर्मला के इस निर्णय से न केवल उसे जीवन की राह मिलेगी अपितु शायद उसका यह निर्णय विशाल के जीवन की भी राह बनेगा। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'