मृग मरीचिका सी इस जिंदगी में, 
भटक रहे हम जाने किस तलाश में।

जाने किस चेहरे में भटक रहे, 
प्रभु के चरणों की तलाश छोड़।

बचपन की मृदुलता को छोड़, 
अहंकार को ही हम तलाश रहे।

एहसास की खुशबू को छोड़ हम,
नफ़रतों की बगिया तलाश रहे। 

सुकूने ए तलाश में भटकी जिंदगी, 
रब्ता रब्ता रिश्तों को भूल रहे हम ।

सुलगती रेत में तलाश रहे पानी, 
फिर भी प्यास कभी बुझती नहीं।

खुदा की इबादत में करे खुद की तलाश , 
तलाश मुकम्मल होती उस दर पर जाकर। 
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली 
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