हम तेरे शहर में आये है मुजरिम बनकर
क्योंकि किश्मत ने भेजा है
बेरंग हमें
बैठे डोली में विदा होके गये
कुछ दिनों बाद ही
लौट आये है
जिनको कहते है सभी अपना सा
लगने लगा हमे तो सपना सा
कुछ लोभियों ने रुलाया हमको
रिश्ते नातो ने भी तुलवाया हमको
जाए तो कहा जाए हम
बनकर मुजरिम ही यहां बैठे है
संध्या पंवार

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