बहुत साल पहले निर्मला जब पढाई के लिये दूसरे शहर के लिये निकली थी, उस समय शांताराम और सुजाता की आंखों में आंसू आ गये थे। दोनों बेटी को उसके कालेज तक छोड़ने भी गये थे। आज जब निर्मला वृन्दावन के लिये जा रही थी, तो फिर से वही स्थिति दिखाई देने लगी। सुजाता और शांताराम ने बेटी को हर तरह की सलाह दीं। वैसे अब बेटी की समझदारी पर संदेह नहीं किया जा सकता है। वह तो खुद माता पिता से भी ज्यादा समझदार है। तभी तो डाक्टर निरंजन और उनके बेटे झूठे डाक्टर की हकीकत सामने आ पायी। फिर भी माता पिता का विशेष कर्तव्य होता है। आज भी निर्मला पिता और माॅ की सलाह उसी तरह सुन रही थी मानों वह छोटी बच्ची ही हो।

   रेलवे स्टेशन तक शांताराम और सुजाता दोनों निर्मला को छोड़ने भी आये। अपने परिचितों से पूछकर उन्होंने रास्ते की पूरी जानकारी इकट्ठी कर ली थी। आखरी बार भी समझा रहे थे।

  " गाड़ी मथुरा तक जायेगी। मथुरा में भी दो बड़े स्टेशन हैं। ध्यान से जंक्शन पर उतरना। कैंट पर मत उतर जाना। वहीं जंक्शन के बाहर से वृन्दावन के लिये आटो चलते हैं। वृन्दावन में पहुंचकर अटल्ला चुंकी चौराहे के बाद मुख्य सड़क पर ही अस्पताल है। अस्पताल को लोग काले बाबू अस्पताल ज्यादा बोलते हैं। यही नाम आटो बाले को बताना। पहुंचते ही फोन करना। कितनी भी व्यस्तता हो, रोज एक बार तो बात करती रहना। होशियारी से रहना। हर किसी पर भरोसा मत करना। "

  शांताराम जी निर्मला को समझा रहे थे कि ट्रेन आ गयी। निर्मला अपनी आरक्षित सीट पर बैठ गयी। गाड़ी धीरे धीरे चलने लगी। निर्मला ट्रैन की खिड़की से अपने पिता और माता को देखती रही। निर्मला ने ध्यान से देखा कि दोनो अपनी आंख पोंछ रहे हैं। निर्मला की आंखें गीली हो गयीं। रूमाल से आंखें पोंछने लगी। जब आंख पोंछकर आंख खोली तब तक गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली।

   आज निर्मला को बहुत साल पहले का वह सफर याद आ रहा था। पिता जी उसे कालेज में छोड़ आये। लड़कियों के छात्रावास में उसके रहने की व्यवस्था थी। उसे याद है कि उसके कमरे में उसके साथ जो लड़की रुकी थी, उसने अपना रूम चैंज करा लिया। किसी से कह भी रही थी कि सुबह सुबह जब काली कलूटी दिखाई देती है, तो दिमाग ही खराब हो जाता है।

  निर्मला ने सभी के साथ अच्छा व्यवहार किया पर लगता था कि कोई भी उससे मित्रता करने को तैयार न था। उसे अपनी सहेली मीना की बहुत याद आ रही थी।

  निर्मला बहुत उदास थी। गुस्सा, आत्मग्लानि से भरी थी। उसका आत्मविश्वास डगमगा रहा था। डाक्टरी की कठिन पढाई में आत्मविश्वास का बहुत महत्व है। अभी तक अपनी योग्यता से सभी को अचंभित करती आयी निर्मला शायद डाक्टरी की पढाई छोड़ वापस ही चली जाती। पर ऐसा नहीं हुआ। उसे विशाल का साथ मिल गया। हालांकि निर्मला को विशाल से मित्रता करने में हिचकिचाहट हो रही थी। अभी तक उसने किसी लड़के से दोस्ती नहीं की थी। पर एक बार दोस्ती हो जाने पर निर्मला विशाल पर ज्यादा ही विश्वास करने लगी। शायद उसकी मित्रता कुछ आगे तक पहुंच गयी।

   निर्मला का आत्मविश्वास एक बार वापस आया तो फिर निर्मला रुकी नहीं। शीघ्र ही वह अपनी प्रतिभा से सभी अध्यापकों और छात्रों की चहेती हो गयी। जिस लड़की ने उसका रूम छोड़ा था, उसने खुद उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढाया। होशियार बच्चों से सभी मित्रता करना चाहते हैं। पर निर्मला ने केवल विशाल से ही असली मित्रता रखी। पूरे अध्ययन काल में विशाल ही उसके विभिन्न प्रोजेक्टों में उसका साथी रहा।

   अपने मित्रों से कुछ भी छिपाना सही नहीं माना जाता। शायद इसी लिये विशाल ने निर्मला को लक्ष्मी के बारे में बताया। यह उस समय की बात थी जब विशाल और लक्ष्मी का रिश्ता भी तय नहीं हुआ था। निर्मला ने अपने दिल की बात दिल में ही छिपा ली। अपने दोस्त विशाल को उसने हौसला दिया कि एक न एक दिन तुम्हारा और लक्ष्मी का मिलन जरूर होगा। एमबीबीएस के अंतिम वर्ष पूर्व होने से पूर्व ही विशाल ने निर्मला को वह खुशखबरी सुना दी। आखिर उसका प्रेम सफल होने जा रहा है। उसका विवाह लक्ष्मी से ही तय हो गया है।

  प्रेम वास्तव में प्रेमी से खुशी मांगना नहीं है, बल्कि प्रेमी को खुशी देना है। प्रेम कोई याचक नहीं अपितु प्रेम दाता होता है। विशाल की खुशी में निर्मला उस दिन भी खुश थी। आज भी वह विशाल की खुशियां ही चाहती है।

  यादों में लंबा सफर भी जल्द गुजर गया। मथुरा का कैंट स्टेशन आ गया। कई सवारियां वहीं उतर गयी। ट्रैन फिर से चली और कुछ ही मिनटों में निर्मला मथुरा जंक्शन पहुंच गयी।

  स्टेशन से बाहर निकलते ही अनेकों ओटो बाले दिखाई दिये। वैसे वृन्दावन तक के लिये शेयरिंग में भी आटो चलते हैं। पर निर्मला ने पूरा आटो बुक कर लिया। नये स्थानों पर तो यही सही रहता है। बस जगह बता दो। ओटो बाला सीधा वहीं पहुंचा देता है। कई बार ओटो बालों द्वारा अपरिचितों को ठगने की घटनाएं सुनी जाती हैं। पर इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं है।

  " बहन जी। क्या सोच रही हैं। ओटो बाला ठग तो नहीं रहा।"
निर्मला एकदम हड़बड़ा गयी। यह ओटो बाला इस तरह मन की बात कैसे पढ लेता है।

  " वो तो ऐसा होता ही है भैय्या।"

  " अरे बहन जी। ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। वैसे भी मुझे दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत' ने भेजा है। कहा है कि बहन जी को आराम से वृन्दावन में काले बाबू तक छोड़ कर आना।"

  निर्मला को समझ ही नहीं आया। किसी दिवा शंकर सारस्वत को तो वह जानती भी नहीं है। मथुरा में तो पहली बार आयी है।

" क्या सोच रही हैं बहन जी। दिवा शंकर सारस्वत एक लेखक हैं। ओनलाइन मंचों पर लिखते हैं। वैसे उनकी दो किताबें भी छ्प चुकी हैं। आजकल आप पर ही कोई कहानी लिख रहे हैं।"

  निर्मला समझ गयी कि यह कोई दिवा शंकर सारस्वत नामक लेखक का बहुत बड़ा सा प्रशंसक है। प्रशंसकों की भी अपनी अलग दुनिया होती है। अनेकों बार खुद को अपने प्रेरणा स्रोत से जोड़ लेते हैं। अपनी हर बात को अपने पसंदीदा किरदार से जोड़ लेते हैं। लगता है यह ओटो बाला हर सवारी से ऐसे ही बोलता हो।

   मथुरा जंक्शन से ओटो वृन्दावन के लिये चल दिया। लगता है कि यह ओटो बाला दूसरे ओटो बालों की तरह सीधे वृन्दावन नहीं जायेगा। रास्ते में पड़ती प्रसिद्ध जगहों को बताता जायेगा। संभव है कि रास्ते में मिलते मंदिरों के दर्शन भी निर्मला को कराता जायेगा। हालांकि निर्मला एक समझदार लड़की है। फिर भी लगता है कि वह ओटो बाले पर इतना विश्वास करने लगे। अनेकों बार असंभव जेसी बातें भी संभव हो जाती हैं। वैसे भी इस कहानी में तो आरंभ से ही अनेकों बार असंभव जैसी दिखती बातें संभव होती आयी हैं।

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'