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ओ शिशिर... सुन ना,
ऋतु क्रम में तेरा आना,
एक सुखद एहसास दिलाता है।

अग्नि की प्रचंडता ठंडी हो, प्राणवायु बन जाती है,
अग्नि और मानव का रिश्ता,
बड़े प्रेम से तू समझाता है।

सूखे सुनहरे पत्ते, भूमि तल पे बिखरे स्वर्ण की भांति,
पत्र विहीन वृक्षों में, भविष्य का नवजीवन दिखलाता है ।

दिखती है, कुहासों की धुंध में,
गति थमी सी जीवन की ,
जीवन के धुंध में भी, यों गतिमान रहना सिखलाता है।

रश्मियों की छूअन से, विलीन होती वो कोमल ओस सी,
परिस्थितियो में एकसार हो जाना तू ही बतलाता है।

ओ शिशिर! तेरा आना, 
हर ऋतुओं की भांति ,
बहुत कुछ सीखला जाता है।
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     मौलिक व स्वरचित
      कीर्ति रश्मि नन्द
         वाराणसी