धरती माँ के वीर सपूतों! 
पुन: उठो अहृवान करो!! 
बंजर भूमि राह देखती! 
फिर से उसमें प्राण भरो!! 

नैतिकता के साथ चलो तुम! 
जन जन मानस के ज्ञाता!! 
तुम बिन पोषित कैसे हो हम! 
तुम ही तो हो अन्नदाता!! 

धरती पर जब हल चलते हैं! 
ममता प्यार लुटाती है! 
अपने बच्चों को अन्न देकर! 
धरती माँ मुस्काती है! 

छोडो राजनीति का चक्कर! 
समय न यू बर्बाद करो!! 
धरती माँ  के लाल हो तुम! 
सबके तन में प्राण भरो!! 
श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर लेखिका
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत