कई टिमटिमाते सपने,
जीवन में उसने देखे थे।
एक नीड़ हो उसका जिसमें ,
स्वच्छ और सुंदर जीवन बीते।।
चाहा वह इक घर हो अपना,
जहां प्रेम हो और शांति हो।
देखा वह जीवन का सपना।
जहां सत्य धर्म और अहिंसा हो।।
जीवनपथ पर सदा वह चला,
नित इन मूल्यों को ही थामे।
सोचा इक दिन पूरा होगा ,
वे सभी टिमटिमाते सपने।।
पर यह जग बड़ा ही निष्ठुर था,
धरे रह गये उसके सपने।
जग को उसने बहुत दिया था ,
जग ने न दिया उसको जीने।।
इस जग में अब ईमान कहाँ?
सत्य ,धरम और प्रेम भी कहाँ?
कहाँ शांति और कहाँ अहिंसा?
सदाचार का ठौर ही कहाँ?
पूरा न हुआ घर का सपना,
न ही वे टिमटिमाते सपने।
हर निस गगन में वह ताकता,
टिमटिमाते जुगनू वे हुये।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"

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