किसी भी परिवार, समाज देश की अपनी एक संस्कृति होती है.. उस संस्कृति की धरोहर को वहाँ के संस्कार से ही उकेरा जा सकता है... संस्कार द्वारा प्रारोपित बीज ही संस्कृति के उत्थान में सहायक हो सकता है.... शरीर और आत्मा का जिस तरह की सोच से उद्भव होगा... संस्कृति भी कमोवेश उसी तरह की राह अपना लेती है...
संस्कार ग्राह्य करने के लिए एक तपस्वी की भाँति हमें अपने विचारों की साधना करनी होगी... तभी एक अदम्य इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ कर सही गलत में विभेद कर सकेंगे ... और एक सुसंस्कृत मानव, समाज, राष्ट्र का निर्माण हो सकेगा...
संस्कार और संस्कृति में अन्योन्याश्रय संबंध है... किसी भी संस्कृति को चिरस्थायी बनाने के लिए संस्कार में निहित सद्गुणों को सँवारने की कोशिश होती रहनी चाहिए।
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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