🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
अनजाने जगह पर
हुआ ये ,अजब प्रेम
शांति चारों ओर थी
कुछ भी नहीं शोर
फूलों की बगिया
पर्वत का पहरा
लहराये शांत पवन
फैला रंग सुनहरा
मैं निहारती खो गई
प्रकृति मोहपाश में
बंध गई प्रेमडोर से
हसीन-सी फिज़ा में
प्रेम अटूट अहसास
प्रकृति ने,जो निभाया
प्यार करो, महसूस
उसने है, सिखाया
"अजब प्रेम" में उसके
मैं ऐसे खो गई
सारी दुनिया मेरे लिये
अजनबी सी हो गई
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
मनीषा भुआर्य ठाकुर(कर्नाटक)

0 टिप्पणियाँ