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जीवन पुनः पा सके, दे ऐसा अधिकार कोई।
बहुत पीड़ा से उठती है, हृदय से झंकार कोई।।
होनी ने था तब, अनहोनी को राह दिखाया।
तोड़ गया मेरे जनक के, सांसों का तार कोई।।
पचास की उम्र में, जीवन पूरा तो नहीं होता।
फिर क्यूं छीन ले गया, मेरी मां का श्रृंगार कोई।।
जन्मदिवस पे मेरे, कैसी विपदा आन पड़ी।
जाने कैसे सोएं , उठा न पाया उन्हे इसबार कोई।।
यादें बचपन की, सदा व्याकुल कर देती है।
सुना दे आज भी वो आवाज़, काश! एकबार कोई।
जलराशियां, बिखर ही जाती है आंखो में।
कैसे बताऊं मैं कितना, रोया है जार जार कोई।।
घर और हृदय में, दीपमाला सजाए बैठे रहे
लौटा लाओ हमारे पालनहार को, अबकी बार कोई।।
भुलाए नहीं भूलते, सहोदरों के स्याह चेहरे।
अनाथ सा जीवन का, उन्हे दे बैठा अधिकार कोई।
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मौलिक व स्वरचित
कीर्ति रश्मि "नन्द
वाराणसी

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