जिंदगी की राह में बावरा मन,
अनवरत सफर करता है।
जन्म-मृत्यु से छूट कर वो,
शून्य में विलीन हो जाता है।
न कुछ लेकर आता है,
न कुछ लेकर जाता है।
बीते हुए पलों को,
यादों के झरोखें में छोड़ जाता है।
बाहरी संसाधनों में ढूढता है वो,
मन की एकाग्रता और प्रसन्नता को।
जारी रहता है उसकी आत्मा का सफर,
और बदलता फिरता है कई तन को।
बनकर मुसाफिर भटकता है सुकूँ की तलाश में,
अनभिज्ञ है वो उस मृग की तरह,
नही जानता वो कि कस्तूरी तो है स्वयं में ।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"