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क्या खोया जिंदगी में , पूरा हिसाब मिल गया !
जब पुरानी डायरी में , सूखा गुलाब मिल गया !!

देखती हैं हसरतों से, सूखी पंखुड़ियां भी मुझे !
लगता है जैसे राह में, अधूरा ख्वाब मिल गया !!१

बहते रहे अश्क मेरे , भीगते रहे अल्फाज उसके !
उन अल्फाजों में मुझे, लाजवाब खिताब मिल गया!!२

हर हर्फ मुझसे पूछते , उस खत के बार-बार !
कैसे ठिठुरती रात से ,गले आफताब मिल गया !!३

उसकी हर नज़्म में , मेरी तस्वीर नजर आई !
ईद हो गई मेरी , मेरा महताब मिल गया !!४

उलझी हुई मैं बरसों से , अपने बुने सवाल में !
आज देख कर आईना,मुकम्मल ज़बाब मिल गया !!५

......✍️ पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार