अनिरुद्घ इन दिनों बड़ी विचित्र मनःस्थिति से गुजर रहा था। रह- रहकर उसके जेहन में उड़ीसा के जाजपुर शहर का वह विरजा मंदिर परिसर, विरजा माता की वह दिव्य मूर्ति, वह वैतरणी नदी का तट आदि घूम जाता था। उसका अंतर्मन कुछ पुरानी यादों का हल्का अहसास करा रहा था, पर वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहा था।
एक दिन अनिरुद्ध ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न में उसे विरजा माता ने दर्शन दिये और कहा- " अनिरुद्ध , तुम एक महान आत्मा हो। तुम्हारा जन्म एक विशेष कार्य के लिए हुआ है। तुम्हें दक्षिण के कन्नड़ राज्य के बीहड़ जंगलों में एक महत्कार्य करना है। कुछ समय बाद तुम्हें हिमालय में एक महात्मा के दर्शन होंगे। वे तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे। अति शीघ्र तुम मेरे दर्शन करोगे। तब तुम्हें एक साथी मिलेगी। वह इस महत्कार्य में तुम्हारा साथ देगी। तुम्हारा कल्याण हो!"इतना कहकर माता अंतर्धान हो गई। अनिरुद्ध हड़बड़ा कर उठ बैठा। सुबह के चार बज रहे थे। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह सत्य है या मात्र सपना है। पर उसने स्पष्ट रूप से माता के दर्शन किये थे और माता के वचन अब भी उसके कानों में गूंज रहे थे।
अनिरुद्ध का प्रशिक्षण अंतिम दौर में था। उन्हें उत्तराखंड के जंगलों के अध्ययन के लिये एक सप्ताह के टूर पर ले जाया जा रहा था ,जिसके बाद उन्हें पोस्टिंग ऑर्डर देकर नियत स्थानों में कार्यभार संभालने भेज दिया जायेगा।
उनका पंद्रह दिन का उत्तराखंड के जंगलों में अध्ययन का प्रोग्राम था। उन्हें उत्तराखंड में हिमालय के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र के जंगलों का अध्ययन करने अल्मोड़ा,नैनीताल ,देहरादून,चमोली,पिथौरागढ़,रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ, ऋषिकेश आदि जाना था और उन सभी क्षेत्रों के कुछ जंगलों, वन्य जीवन और प्राकृतिक संसाधनों की विस्तृत जानकारी लेना था।
विभिन्न प्रांतों का अध्ययन करते हुएऔर देवभूमि के अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए वे इस टूर के अंतिम चरण में गंगोत्री, यमुनोत्री ,बदरीनाथ और केदारनाथ सहित ऋषिकेश और हरिद्वार का अध्ययन करना था। भ्रमण का यह अध्याय सभी के लिये अति रोमांचक था।
वे अब ऋषिकेश पहुंचे थे। गाइड ने उन्हें चार -पाँच विद्यार्थियों का ग्रूप बनाकर उस वन्य क्षेत्र में वनस्पतियों के बारे में अध्ययन करने को कहा। अनिरुद्ध वर्मा तेइस वर्ष का गठीले बदन का लंबा, सुंदर ,आकर्षक नौजवान था। वह बहुत ही साहसी था और हमेशा सबसे आगे रहता था।
अपने चार दोस्तों के साथ अनिरुद्ध बातें करते हुए और घूमते हुए कई दुर्लभ झाड़ियों और वृक्षों की जाँच कर रहा था। कुछ देर बाद उसे अपने पीछे कोई आहट नहीं मिली। वह एक बीहड़ जंगल में पहुंच गया। उसने देखा कि उसके सभी साथी पीछे छूट गये और वह अपने साथियों से बिछुड़ गया था। वह गहरे सोच में पड़ गया कि वह क्या करे। उसने जिस रास्ते से आया उसी रास्ते पर वापस पीछे जाने की कोशिश किया। पर उसे कुछ भी संकेत नजर नहीं आ रहे थे। वह अत्यंत साहसी तो था, पर इस नये जगह पर रास्ता खोज नहीं पा रहा था। उसने मोबाइल से अपने साथियों से संपर्क करना चाहा,पर इस घने जंगलों में मोबाइल में कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। हताश होकर वह एक ओर बढ़ गया कि कोई तो नजर आयेगा ,जो उसे रास्ता दिखा सके। तभी उसे थोड़ी दूर पर पहाड़ी गुफा पर नजर पड़ी। उसके कदम स्वतः ही उस और बढ़ गये। पास जाकर देखा तो एक अंधेरी गुफा थी। एक साधु आंखें बंद किये ध्यानमग्न थे। उनके मुखमंडल पर एक अद्भुत आभा तैर रही थी। विभूति से सना माथा, हृदय और बाहुएँ, गले में रुद्राक्ष, विशाल नेत्र, कमंडलु और त्रिशूल के साथ वे साक्षात् शंकर भगवान से लग रहे थे।
अनिरुद्ध वहाँ एक शिला पर बैठा इंतजार करने लगा। आंखैं खोलने पर वह उस महात्मा से रास्ता पूछना चाहता था। कुछ देर बाद उस महात्मा ने आंखें खोली। अनिरुद्ध उन्हें देखकर नतमस्तक हो प्रणाम किया।
वे मंदहास करते हुए आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाकर कुछ बुदबुदाये। फिर गंभीर वाणी में पूछे-"क्यों वत्स , तुम रास्ता भटक गये हो? अनिरुद्ध तुम रास्ता नहीं भटके, मैंने ही तुम्हें मेरे पास बुलवाया है।" "पर स्वामी, मुझे आपने क्यों बुलवाया है? आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?"अनिरुद्ध बोला।
"वत्स, मैं चिद्घनानंद हूँ, मुझे पता है कि तुम्हें विरजा शक्तिपीठ के उपासक मेरे शिष्य स्वरूपानंद ने मेरे बारे में बताया है। मुझे पता था कि तुम आओगे।" वह महात्मा बोले। " मैं धन्य हूँ प्रभु! कृपा कर बतायें कि आप ने मुझे क्यों बुलाया है।"अनिरुद्ध ने कहा।
चिद्घनानंद स्वामी ने अनिरुद्ध के सर पर अपना हस्त रखा। अनिरुद्ध मानों सुशुप्तावस्था में चले गया। उसे अपने देह की सुधि नहीं रही।
दक्षिण में चालुक्य राजाओं का राज्य था। राजा जयसिंह मान्यखेत नगर को राजधानी बनाकर शासन कर रहा था। उसकी वीरता के आगे सभी राजा नतमस्तक थे। दक्कन के विशाल भूभाग पर उनका एकछत्र राज्य था। उनके राज्य की पश्चिमी सीमा पर पश्चिमी घाट पर्वतमाला के पर्वतशिखरों से घिरा यह मान्यखेत नगर सामरिक दृष्टि से अति सुरक्षित था। यह नगर एक घाटी में बसा था।
नगर द्वार पर भैरवनाथ की भव्य मंदिर थी। बाबा भैरवनाथ उस नगर के रक्षक और क्षेत्रपाल थे। नगर के अंदर गौरी माता का महादेव सहित एक भव्य मंदिर था। वह नगर अति समृद्ध था। प्रजा बड़ी सुखी थी। चालुक्य राजाओं का पूरे दक्षिण में आधिपत्य था। राजा जयसिंह की पुत्री देवसेना अति रूपवती थी। राजा जयसिंह की वह एकमात्र संतान थी। उनका कोई पुत्र संतान नहीं था।
उस समय कलिंग देश में राजा नरसिंहवर्मन का राज्य था। उसके चालुक्य साम्राज्य से अच्छे संबंध थे। नरसिंहवर्मन का एक ही पुत्र अनंतवर्मन था। अनंतवर्मन बड़ा वीर और सुंदर राजकुमार था। वह चालुक्य राजकुमारी देवसेना के सौंदर्य को देखकर मुग्ध था। देवसेना भी उससे अत्यंत प्रेम करती थी थे। दोनों में प्रगाढ़़ प्रेम संबंध थे। चालुक्य राजा जयसिंह ने कलिंग से अपनी मित्रता और सुदृढ़ करने के लिये अपनी पुत्री का विवाह कलिंग के राजकुमार अनंतवर्मन से निश्चय कर दिया।
राजा जयसिंह का सेनापति वज्रनाभ युवा और अत्यंत वीर पुरुष था। वह मन ही मन राजकुमारी देवसेना से प्रेम करता था , पर राजा के भय से उसे गुप्त रखा था। देवसेना को इसका आभास हो गया था। पर वह कलिंग राजकुमार अनंतवर्मन को अपना पति मान ली थी। अतः वह वज्रनाभ को नहीं चाहती थी। पर वज्रनाभ राजकुमारी को किसी भी तरह विवाह करना चाहता था। वह कुटिल युक्ति करना शुरू कर दिया। उसने कर्कोटक नाम के एक मांत्रिक को बहुत सारा धन देकर राजकुमारी पर वशीकरण मंत्र का प्रयोग करने को कहा। रानी सुनयना देवी और राजकुमारी देवसेना माता गौरी के परम भक्त थे। माता गौरी की कृपा से अति शीघ्र ही राजकुमारी देवसेना का विवाह निश्चित हो गया था। कलिंग राजा नरसिंहवर्मन परिवार सहित चालुक्य राजधानी मान्यखेत पहुंचे। सेनापति वज्रनाभ इस विवाह को रोककर खुद राजकुमारी से विवाह करने के लिये एक सुदृढ़ योजना बना डाली। चालुक्य राजकुमारी से विवाह करने से वह चालुक्य राज्य का भावी राजा भी हो जायेगा। अतः उसने सेना के एक बड़े भाग को अपनी ओर मिला लिया और अनंतवर्मन की हत्या और राजकुमारी देवसेना के अपहरण की योजना बना डाला।
जब कलिंग राजपरिवार चालुक्य राजधानी मान्यखेत में प्रवेश कर गई, तभी सेनापति वज्रनाभ ने कलिंग राजपरिवार और सेना पर धावा बोल दिया। उसने राजा जयसिंह को बंदी बना लिया। इस अप्रत्याशित हमले और मान्यखेत से बाहर जाने का मार्ग न होने से कलिंग सेना का एक बड़ा भाग धराशायी हो गया। राजकुमार अनंतवर्मन घोड़े पर राजकुमारी देवसेना को लेकर कलिंग की ओर भागने लगा ,पर सेनापति वज्रनाभ ने उसका पीछा कर मार डाला। जब तक वज्रनाभ राजकुमारी देवसेना को बंदी बनाता, वह राजकुमार अनंतवर्मन के कमर से लटकती तलवार खींचकर अपना सिर काट ली। इस भीषण युद्ध को देखकर जो प्रजा जीवित बची, वह नगर छोड़कर भाग गई। राजधानी मान्यखेत निर्जन और वीरान हो गई।
इसके बाद वज्रनाभ ने मांत्रिक कर्कोटक को पूरे मान्यखेत नगर को मंत्र प्रयोग से बंधन कर देने को कहा। धन के लोभ में उस मांत्रिक ने मान्यखेत नगर को बंधित कर दिया, ताकि बाहर से कोई उस नगर में प्रवेश न कर पाये और अगर कोई उस नगर में घुसने की कोशिश करे तो जीवित न बच पाये। तब से वह मान्यखेत नगरी अभिशप्त होकर बीहड़ जंगल हो गई और भैरवनाथ मंदिर के निकट होने के कारण कालांतर में भैरवघाटी के नाम से जानी जाने लगी । मांत्रिक के मंत्र प्रभाव से सभी मृत आत्माएं वहाँ घाटी में सदियों से भटक रही है। सेनापति वज्रनाभ को कुछ दिन पश्चात चालुक्य राजा जयसिंह के मंत्री बसवप्पा ने मार डाला। वह मांत्रिक कर्कोटक सदियों से अपने क्षुद्र शक्तियों के बल पर अदृश्य रूप से इन्हीं पहाड़ियों में रहता है।
अनिरुद्घ के सामने यह पूरा दृश्य घूम गया। स्वामी चिद्घनानंद बोले-" वत्स, तुम्हें उस मांत्रिक का वध करके उस मान्यखेत नगरी को मांत्रिक के तंत्रजाल से मुक्त करना है। यह महत्कार्य तुम कर पाओगे। तुम्हें कब क्या करना है , मेरा शिष्य स्वरूपानन्द बतायेंगे और वे सदा तुम्हारे साथ रहेंगे। इस महत्कार्य में तुम्हारे संग एक सहचरी रहेगी जो पूर्वजन्म में राजकुमारी देवसेना थी। अति शीघ्र तुम बिरजा क्षेत्र में स्वामी स्वरूपानंद से मिलोगे और वहीं तुम्हें तुम्हारी सहचरी मिलेगी। वह भैरवघाटी ही भविष्य में तुम्हारा कार्यक्षेत्र होगा। यह स्वर्ण अंगुलिका मैं तुम्हें प्रदान करता हूँ। इसे तुम अपने हाथ में पहनो। यह सदा तुम्हें दुष्ट शक्तियों से रक्षा करेगा। साथ ही यह अंगुलिका तुम्हारे ऊपर कोई मंत्र का प्रभाव होने नहीं देगा। अब तुम प्रस्थान करो, चिरंजीवी भव,विजयीभव! " कहते हुये स्वामी चिद्घनानंद ने अनिरुद्ध के सिर पर हाथ रखा। दूसरे ही क्षण अनिरुद्ध कैंप में अपने साथियों के पास पहुंच गया।
(शेष अगले भाग में)

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