आ गए हैं आज वो अपना सबकुछ छोड़ कर
जैसे बादल आ गए हों हवाओं का रुख मोड़ कर
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बरस पड़े हैं जोर से आज मेघ देखो जरा
जैसे भवरे मंडरा रहे हों फूलों से रिश्ता जोड़कर
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न खुद की है चिंता उन्हें न है चिंता किसी और की
वो ऐसे आकर के मिले जैसे चांदनी हो चकोर की
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आ गए हैं आज वो अपनों से रिश्ता तोड़कर
जैसे बादल आ गए हों हवाओं का रुख मोड़ कर
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मैंने पूंछा क्यूँ आई हो इन काँटों भरी राह मे
वो बोली मै आई हूँ बस "लखनवी" तेरी चाह मे
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आ गए हैं आज वो न जाने क्या सोचकर
जैसे बादल आ गए हों हवाओं का रुख मोड़कर
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आपका मुकेश लखनवी

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