प्रेम की ऐसी गति है कि ,ये न धर्म देखता है, न अमीरी गरीबी,,न ही मित्र शत्रु ,बस हो ही जाता है।
अमीर खुसरो ने प्रेम के बारे में लिखा है___
खुसरो दरिया प्रेम का,उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया,जो डूबा सो उतराए।
ऐसी ही प्रेम कहानी है , दैत्य राज बाणासुर की पुत्री उषा और श्रीकृष्ण के पोते ,और प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध की।
बाणासुर दैत्यराज बलि के 100 पुत्रों में से एक था।महादेव की आराधना कर उसने अपने दुश्मनों को परास्त कर शोणितपुर का सिंहासन हासिल किया । उसने महादेव से 1000 भुजा का भी वरदान प्राप्त किया था,और साथ में महादेव उसकी हमेशा रक्षा करें उसके वचन भी लिया ।
वरदान प्राप्त कर वह अत्यंत अहंकारी और क्रूर बन गया।त्रिलोक को भी आतंकित कर दिया।
महादेव ने उसे बार बार सचेत किया,अंत में महादेव ने कहा ,जिस दिन तुम्हारे महल के सामने की पताका गिर जाएगी ,उस दिन समझ लेना तुम्हारी पराजय तय है।
माता पार्वती की कृपा से बाणासुर को पुत्री की प्राप्ति हुई ,जो अत्यंत रूपवती और गुणवती थी।नाम रखा गया उषा।
चंद्र की कलाओं की तरह धीरे धीरे वह बढ़ने लगी। उसकी अंतरंग सहेली थी चित्रलेखा। चित्रलेखा बाणासुर के मंत्री कुम्भाण्ड की पुत्री थी।
(एक रात अचानक प्रगाढ़ नींद में सोती राजकुमारी जाग गई)
दासी जाकर चित्रलेखा को बुला ला_राजकुमारी उषा अचानक पसीने से लथपथ हुई,नींद से जागी।
क्या हुआ राजकुमारी जी?_दासी ने पूछा।
ज्यादा सवाल न पूछ ,बस चित्रलेखा को घर से बुला ला_खीझ कर उषा ने कहा।
दासी दौड़े दौड़े चित्रलेखा को बुलाने गई।
चित्रलेखा ,दासी के साथ उषा के पास पहुंची।
चित्रलेखा ने पूछा ,ऐसी क्या बात हो गई राजकुमारी जी? रात को ही बुला लिया,सुबह तो होने देती।
बात ही कुछ ऐसी थी चित्रलेखा_ उषा ने कहा।
मैने सपने में एक राजकुमार को देखा ,कामदेव की तरह अतिसुंदर ।उसे देखते ही मुझे प्यार हो गया।चित्रलेखा तुम पता करो ,कौन है वो राजकुमार?
चित्रलेखा योगिनी थी ,वह कई विद्या में पारंगत थी।उसने अपने योगबल से एक चित्र बनाया।
राजकुमारी जी क्या यही पुरुष था???_चित्रलेखा ने पूछा।
हां हां ,यही ,इन्हें ही मैंने सपने में देखा था और उनसे मुझे प्यार हो गया _उषा ने कहा।
ओह हो,मेरी सहेली राजकुमारी जी ,को सपने वाला राजकुमार चाहिए_चित्रलेखा ने छेड़ते हुए कहा।ये श्रीकृष्ण के पौत्र ,और प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध हैं।
उषा के कपोल लज्जा से लाल हो गए।
चित्रलेखा ,आकाश मार्ग से द्वारिका के राजमहल में सोते हुए, अनिरुद्ध को पलंग सहित उठा लाई।
अनिरुद्ध की जब नींद खुली तो उसने अपने आप को दूसरे राजमहल में अपरिचित लोगों के बीच सोता पाया। चकित हो वह आस पास देखने लगा।
फिर उसने गुस्से से दांत भींचते हुए कहा _मैं कहां हूं?,किसकी इतनी जुर्रत जो मुझे मेरे शयनकक्ष से उठा कर इस अनजान राजमहल में ले आया है। ये जगह कौन सी है?
तुमलोगों को पता भी है ,मैं कौन हूं?अगर मेरे पितामहों को पता चला तो वो इस राज्य को नेस्तनाबूत कर देंगे।
राजकुमार गुस्से से लाल पीला हो रहा था।
राजकुमारी आगे आई__ राजकुमार आप क्रोधित न हों,ये दैत्यराज बाणासुर का राज्य शोणितपुर है,ये अंतः पुर है। आप यहां पूर्णतः सुरक्षित हैं।
मैं राजकुमारी उषा हूं। ये मेरी सहेली चित्रलेखा (सहेली की ओर इशारा कर) है,इसी ने ही मेरे प्रेम की खातिर आपको यहां तक लाने का दुस्साहस किया था।
प्रेम??? आपका प्रेम?मैं तो आपको जानता तक नहीं ,कभी नाम तक नहीं सुना ,तो मैं आपका प्रेम कैसे हो सकता हूं।
आपको कुछ गलतफहमी हो गई है,कृपया करके मुझे द्वारका जाने दें,अन्यथा परिणाम बुरा होगा।
उषा ने कहा _राजकुमार आपके ही प्रेम पाश में फंस कर मेरा चैन छिन गया है ,आप ही हो मेरे सपनों के राजकुमार।
मैंने सपने में आपको देखा और ,मुझे आपसे प्रेम हो गया।
फिर उषा ने चित्रलेखा द्वारा बनाया ,अनिरुद्ध की तस्वीर दिखाया ।अनिरुद्ध अब धीरे धीरे वस्तु स्थिति को समझने को कोशिश कर रहा था।
उषा अनुपम सुंदरी थी ऐसा सौंदर्य की,स्वर्ग की अप्सराएं भी उसके आगे फीकी पड़ जाएं। उन्मुक्तता, निश्छल हंसी ऐसा लगता, जैसे मोती झर रहे हों, कमनीय काया ,और खुला प्रेम आमंत्रण, किसी भी पुरुष को अपने मोहपाश में बांधने में सक्षम थे,शायद ही कोई अभागा हो जो उषा के सौंदर्य से मुंह फेर ले।
धीरे धीरे अनिरुद्ध पूरी तरह भौंरे की तरह प्रसून के सौंदर्य में आबद्ध हो गया।
कामदेव के तीर दोनों को चुभ चुके थे,अब तो समय का कोई भान हो न रहा,वे एक दूसरे में पूर्णतः खो चुके थे।दिन पर दिन संबंध प्रगाढ़ हो रहे थे ,तन और मन दोनों से।
अंतः पुर में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था इसलिए कोई उनकी प्रेम लीला को कई महीनों तक भांप न सका।
धीरे धीरे राजकुमार को महल से गायब हुए 4 महीने बीत गए थे।चारों ओर तलाश हो रही थी ,लेकिन परिणाम शिफर।चारों ओर से गुप्तचर असफल लौट रहे थे।
वर्षा ऋतु आ गई थी,प्रकृति पूरे यौवन पर थी,चारो ओर हरियाली की चादर बिछ गई, दादुर, मयूर,काले मेघ, और रह रह कर कड़कती बिजली ,उनके सहचर्य के साक्षी बन रहे थे।
समय बीत रहा था, उषा के शरीर में पुरुष संसर्ग से आए परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे।
द्वारपाल इस परिवर्तन को भांप गए।उन्होंने ये सूचना दैत्यराज को दी, कि राजकुमारी का किसी पुरुष के साथ अवश्य संबंध है।
बाणासुर सीधे अंतः पुर के लिए रवाना हुआ।वहां राजकुमारी को एक पुरुष के साथ चौसर का खेलते देख , बाणासुर का क्रोध अपने चरम पर पहुंच गया।
राजकुमार का परिचय उसके क्रोधाग्नि में घी का काम कर गया।
श्रीकृष्ण से तो जन्मों का वैर था।
उसने अनिरुद्ध को युद्ध के लिए ललकारा ,राजकुमारी उषा ने पिता को समझाने का प्रयास किया कि गलती उसकी है ,राजकुमार की नहीं,लेकिन क्रोध में बाणासुर ने उषा को , निर्लज्ज कह दूर धकेल दिया।
अनिरुद्ध और बाणासुर का युद्ध हुआ , बाणासुर ने नागपाश में बांध अनिरुद्ध को बंदी बना लिया।
इधर द्वारका में अनिरुद्ध का इतने दिनों तक कोई हाल खबर न मिलने पर नैराश्य का माहौल व्याप्त था।अचानक देवर्षि नारद का द्वारका की राजसभा आगमन हुआ।
बहुत दिनों बाद कहिए कैसे आगमन हुआ देवर्षि, आसन ग्रहण कीजिए_श्रीकृष्ण ने पूछा।
मैं यहां एक विशेष प्रयोजन से आया हूं,वासुदेव।
आपलोग अनिरुद्ध को लेकर काफी परेशान हैं?
जी हां देवर्षि_बलराम जी ने कहा।
अनिरुद्ध शोणितपुर में है, वाणासुर ने उसे नागपाश में बांध कैद कर लिया है।
दरबार में सब उठ खड़े हुए, म्यान से सभी ने तलवारें निकाल लीं।
बाणासुर की इतनी हिम्मत,सेनापति सेना तैयार करो_बलराम जी ने आदेश दिया।
नारद ने पूर्ण कथा श्रीकृष्ण को बताई ,और ये भी बताया कि आपको महादेव से भी युद्ध करना पड़ेगा।
चतुरंगिनी सेना श्रीकृष्ण और बलराम के नेतृत्व में शोणितपुर के लिए कूच कर गई।
बाणासुर ने देखा उसके महल के सामने का पताका खुद ब खुद गिर गई। उसे महादेव की बातें याद आ गईं।
बाणासुर को खबर मिली की द्वारका से श्रीकृष्ण और बलराम के नेतृत्व में सेना शोणितपुर पर हमला करने आ रही।
बाणासुर ने अपनी सेना को भी तैयार रहने का आदेश दे दिया।
बाणासुर और श्रीकृष्ण का भयंकर युद्ध हुआ, श्रीकृष्ण ने उसकी सारी भुजाएं काट दीं,और जैसे ही उसका सिर सुदर्शन चक्र से काटने को हुए ,उसने तुरंत महादेव को याद किया ,महादेव अपने गणों के साथ उपस्थित हुए ।
महादेव और श्रीकृष्ण का भयंकर युद्ध हुआ।
देवलोक ,भूलोक ,पूरा चराचर इस भयंकर युद्ध की विभीषिका से कांप उठा।
तब सभी देवों ने आकर विनती की।तब महादेव ने श्रीकृष्ण का रहस्य बाणासुर को बता कर कैलाश के लिए प्रस्थान किया।
बाणासुर ने परमसत्ता को पहचान ,अपनी पुत्री और जामाता को ढेरों मणि माणिक्य के साथ ,श्रीकृष्ण को सौंप दिया।
इस प्रकार अनिरुद्ध और उषा की प्रेम कहानी का अंत और उनके विधिपूर्वक दांपत्य जीवन की शुरूआत हुई।

0 टिप्पणियाँ