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झूम उठी हैं रह एक कलिया बाग़ में
ऐसी निखरी हैं रंग हर एक फूलो की
लगता हैं किसी के दिल की राग़ सुना रही
चहक चहक कर गीत कोई गा रही हैं पंछी...
आसमान पर छाए काले घने बादल भी
रिम झिम कर के ज़मीं पर बरस रहा हैं
पिघल कर ये बुँदे मेरी इन हथेलियों में
नाजाने मुझसे क्या कहना चाह रही हैं....!!
कैसी नशा बिखेरी हैं इन हवाओ ने हर तरफ
मदहोशी सी छा रही हैं दिल में बढ़ रही मेरी धड़कन
कर ना ले दिल कोई गुस्ताखी ऐसी डर हैं मुझे
जो हवाओ के संग मेरी ज़ुल्फ भी मेरी गालो से खेल रही....!!
तड़प उठती हैं दिल मेरी जब जब गरजती हैं बादल
मुश्किल से संभाल कर बांधे हैं हमने बहकती आँचल
हैं किसीका साज़िश या कोई गुनाह पर उतर आयी ये मौसम
या किसी के बहकावे में ये भी हमसे छेड़खानी कर रही....!!
जी करता हैं भीग जाऊ इस सावन की पहली बारिश में
फिर जाने कब ऐसी बौछार हो इन बूंदो में जो नशा हैं
कशिश भरी ये झोंके पवन के मुझे छूकर जब गुजरती हैं
खुशबू बिखर जाती हैं साँसो में मेरी रोम रोम हैं पिघला रही...!!
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नैना...✍️✍️💓
(काल्पनिक...)

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