इक्कीसवीं सदी में हमारे समाज में , समाज की छोड़िए ... हमारे घरों में ही लोग इस बात की दुहाई देते हैं कि आज लड़कियां और औरतें किसी से कम नही है वें मर्दों की तरह ही सब काम कर सकती है और आजाद हैं । बड़े - बुजुर्ग तों यहाॅं तक कहते हैं 
" यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता " 
अर्थात जहाॅं नारी की पूजा होती है वहाॅं देवताओं का वास होता हैं । 
लेकिन क्या उन्हें वह हक और सम्मान मिल पाता है जिसकी लोग दूसरों के सामने छाती ठोककर दुहाई देते हैं । ऐसी बातें सिर्फ कहने - सुनने तक ही सीमित हों गई है । आज के परिवेश में इसकी महत्ता खोती जा रही है । 
समाज में बैठे ऐसे ही ठेकेदारों की सोच और उन सोच के कारण किसी और के जीवन में उत्पन्न संघर्ष की कहानी है " मृणाल - एक संघर्ष कथा " । 

मृणाल ...   अपने    नाम    के    अनुरूप    ही   नम्र , स्वाभिमानी, महत्वकांक्षी, आत्मविश्वासी और सकारात्मक सोच वाली लड़की । पिता की छत्रछाया 
में पली - बढ़ी मृणाल घर के काम - काजों के साथ - साथ पढ़ाई में भी अव्वल रहती थी । दोहरी जिम्मेदारियों के बोझ तले भी वह हमेशा स्वयं को खुश रखती साथ ही पिता और अपने छोटे भाई को भी । मृणाल की उम्र महज़ आठ साल की ही थी कि माॅं का साया उसके सिर से उठ गया ।  उसका छोटा भाई भी तो पाॅंच साल का ही था । 

जिस उम्र में लड़कों का काम सिर्फ पढ़ाई करना होता है मृणाल पढ़ाई-लिखाई के साथ - साथ घर - परिवार और  चुल्हें - चौंके जैसी जिम्मेदारियों को निभा रही थी । मृणाल की सहेलियां उसे घूमने - फिरने , अपने क्लास के लड़कों से बातचीत और उनसे दोस्ती करने के लिए कहती लेकिन वह सिर्फ अपने दिल की मानती , किसी की नहीं सुनती और उसका दिल तो उसी बात को मानता था जिसमें उसके पिता और भाई की खुशी होती थी । 

एक परिवार को एकजुट रखकर चलाने की जिम्मेदारी माॅं की होती है । उसे पता होता है कि परिवार को कैसे सींचना है ?? मृणाल माॅं तों नहीं थी लेकिन अपने परिवार को कैसे एकजुट रखना है , कैसे सींचना है ?? उसे मालूम था । 

परिस्थितियों ने बचपन से ही इतना तो उसे सीखा ही दिया था कि वह उस परिवार की माॅं नहीं होते हुए भी माॅं बन चुकी थी । मृणाल का छोटा भाई गुलशन जों महज उससे तीन साल ही छोटा था अपनी बड़ी बहन को एक माॅं की तरह ही  मान- सम्मान देता था । 

आस-पास के लोग मृणाल और उसके परिवार के संघर्ष को जानते और समझते थे इसलिए उस परिवार में जब खुशियों ने दस्तक दी तब हर किसी के दिल से बस एक ही दुआ निकली " इस परिवार को किसी की नजर ना लगे " 

मृणाल का छोटा भाई बैंक में मैनेजर हो गया था और यह थी उस परिवार में खुशियों की पहली दस्तक । मृणाल की तपस्या रंग लाई थी और तमाम कष्टों और परेशानियों को झेलते हुए आज उसका भाई इस लायक हो गया था कि वह अपने परिवार को संभाल सकें । 

पूरा परिवार बहुत खुश था । एक भाई भी अपनी बहन के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भूला नहीं था । 
उसने अपनी बहन की शादी करने के लिए लड़का ढूॅंढना शुरू कर दिया था । 

मृणाल तब तक शादी कर अपने ससुराल में कदम नहीं रखना चाहती थी जब तक कि उस घर  को जिसे उसे छोड़ कर एक ना एक दिन जाना  था चलाने वाली उसकी भाभी ना आ जाए । 

दुनिया की रीत से अलग उसकी सोच थी जिसे कोई भी यह कहकर मानने के लिए तैयार नहीं था कि बड़ी बहन की शादी हुए बिना छोटे भाई की शादी कैसे हों सकती हैं ?? 

छोटे भाई ने अपनी बड़ी बहन को समझाने का हरसंभव प्रयास किया लेकिन अपनी माॅं समान बहन को नहीं समझा पाया । 

मृणाल जों उस घर की माॅं थी उसके दिल में अब सिर्फ एक ही हसरत थी " उस घर को सदा के लिए छोड़ने से पहले वह घर को संभालने वाली सौंप कर जाएं " 

मृणाल की अटल इच्छा को उसके छोटे भाई ने उसका मान रखने के लिए पूर्ण किया और जल्द ही 
उस घर को उसकी स्वामिनी मिल गई । 

मृणाल की खुशी का ठिकाना न रहा । आस-पड़ोस की सारी सहेलियां ब्याह कर अपने ससुराल में थी इसकारण वह अपनी खुशी अपनी सहेलियों से भी बाॅंट नहीं सकती थी । 

मृणाल की उम्र तीस पार कर चुकी थी । घर और परिवार के प्रति जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में  
कब वह तीस पार गई उसे खुद भी स्मरण नहीं था । 

छ: महीने बीत चुके थे । अपने छोटे भाई की परेशानी अब वह समझने लगी थी । अपनी बड़ी बहन से छुपकर जब वह अपने पिता से बातें करता , मृणाल दोनों के चेहरे पर उभरती चिंता की लकीरों को देखकर समझ जाती कि उसकी उम्र उसकी शादी में अड़ंगा डाल रही है । 

मेरी बेटी में कोई दोष नहीं , वह तो सर्वगुण संपन्न लड़की हैं , जिस घर जाएंगी घर के भाग्य ही खुल जाएंगे गुस्से में कहें गए   शब्दों की यह वर्णमाला मृणाल के पिता के मुख से कहें गए  आखिरी वर्णमाला साबित हुए । 

मृणाल ने अपने पिता को खो  दिया । जिन पिता का हाथ मेरे सिर पर इतनों सालों तक रहा वह और दिन भी रहता अगर मैं उसका कारण ना बनती । मैं ही अपने पिता की मौत का कारण बनी यह कहते हुए मृणाल  बिलख - बिलख कर रो पड़ी और रोते - रोते ही अपने मृत पिता की छाती से लग गई । 


क्रमशः 

" गुॅंजन कमल " 💓💞💗