मुँह में दबाए पान-ए-जर्दा,
रंगीला मुँह हो गया बे-पर्दा।
प्रीत के रंग में रंग गया ऐसे,
धागा बाँध गया मीत संग जैसे।
पान में मिला इश्क की सुपारी,
बना गए वो मुझे भी अनाड़ी।
देख तुझे लगा जैसे बनारसी पान,
मिलकर बन गए हम हीरों की खान।
पान के पत्ते लबों पे ऐसा फिरा,
लगे जैसे बज उठा कोई मंदिरा।
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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मंदिरा - मधुर ध्वनि

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