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पुरवइया बैरन इतरा गयी
मन मयूर नचा गयी
चहुं दिशी अवलोकित
हरितिमा से धरा सुशोभित
श्रावण मास में "प्यारी
हरियाली देख मैं हारी
हारी,सुख अपने जिया की
राह तकूं अब पिया की
कम्पित होके जलतरंग
बजाते हैं मन के मृदंग
श्रावण मास में "प्यारी
तन मन दूं उन पे वारी
वारी, हर्षित सी मैं अलबेली
भूमि सी अपने पी की सहेली
अच्छादित जिसने मुझे किया
वो सांवल मेघ मेरे पिया
श्रावण मास में "प्यारी
सूंदरता निखारूं सारी
सारी,उपमा दे दूं धरती को
जीवन जीवों में भरती जो
मास सावन का जब भी आता
यौवन धरा का यह लाता
श्रावन मास में "प्यारी
थिरक उठी धरा हमारी
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स्वरचित व मौलिक
कीर्ति रश्मि "नन्द
वाराणसी

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