हमारी मोहब्बत का एक अलग ही आधार था।
मुकाम तक कैसे पहुंचता त्रिकोणीय प्यार था।।
हम उनको चाहते रहे दिलो जान से।
पर वह कहीं और ही थे बे इंतहान से।।
मुकम्मल ना कभी भी हमारे प्यार का जहां हो पाया।
मोहब्बत वापस आने के इंतजार में मैं कहां से पाया।।
हम इंतजार करते रहे क्योंकि वह मेरा संसार था।
मुकाम तक कैसे पहुंचता जो त्रिकोणीय प्यार था।।
अपनी अपनी चाहत में भागते रहे पर कुछ ना मिला।
हम कभी भी सच स्वीकार न सके फिर कैसा गिला।।
प्यार हमेशा से ही मेरा उसके लिए ही बरसता रहा।
मैं उसके और वह किसी और के लिए तरसता रहा।।
वह हमसे मुस्कुराते थे यह उनका आभार था।
मुकाम तक कैसे पहुंचता त्रिकोणीय प्यार था।।
नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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