जिंदगी से ठुकराई हुई,संतो चलते चलते कब सड़क पर आ खड़ी हुई,पता ही नहीं चला।
बहुत सी बसें गुजर रहीं थीं,कुछ उसे देखकर रुक जाती ,लेकिन संतो मूर्तिवत खड़ी रहती।
खड़े खड़े उसके पैर दुखने लगे ,तभी एक बस रुकी ,संतो अनायास ही इसमें चढ़ गई।
और वो जाकर एक सीट पर पीछे बैठ गई।
अपने अपने गंतव्य पर एक एक कर सभी यात्री उतर गए ,लेकिन संतो बैठी रही ।
आखिर कंडक्टर ,संतो के पास आया ,उसने कहा ,_ कहां जाना है ??,इससे आगे बस नहीं जाएगी ।
आ ,हड़बड़ा कर संतो बोली _कहां की बस है ,कंडक्टर ,की आंखें फैल गई ,दिल्ली है तुम्हें कहां जाना था।
संतो खुद को संयत करते बोली ,अरे नहीं भैया ऐसी बात नहीं ,थोड़ी आंख लग गई थी ,दिल्ली आ गया क्या??।धन्यवाद भैया ,आपने बता दिया।कह सामान ले संतो उतर गई।
कंडक्टर ने उसके हाव भाव से जान लिया था कि ,ये महिला कुछ ठीक नहीं लग रही ।
कंडक्टर राधेलाल राज्य परिवहन निगम का कर्मचारी था,वह काफी सुलझा और सभ्य व्यक्ति था, उसका परिवार दिल्ली में ही रहता था।आज से उसका दो दिन का रेस्ट था।
उसने दुनिया देखी थी,उसने बहुत से घर से भागी लड़कियों को उनके घर पहुंचाया था।वह सवारी के हाव भाव से जान जाता था।
संतो की हालत उसे एक दुखियारी स्त्री की तरह लगी।वह लगातार संतो पर नजर रख रहा था।उसने देखा ,संतो अपना सामान रख एक बेंच पर बैठ गई,आस पास कुछ लड़के मंडरा रहे थे।वे मौका ताड़ किसी का सामान उठा चंपत हो जाते थे,ये बात राधे लाल को पता थी।
आखिर वह धीमे धीमे कदमों से संतो की तरफ बढ़ा ,और संतो के निकट आकर उसने पूछा ,और बहन जी कहां जाएंगी ,कोई लेने आने वाला है क्या?
संतो पहली बार गांव से शहर आई थी ,वो भी राजधानी दिल्ली ,यहां की भाड़ दौड़ , हल्ला गुल्ला ,चकाचौंध सब कुछ देख उसका दिमाग काम ही नहीं कर रहा था।
किसी पर विश्वास करने की हिम्मत भी नहीं थी ,और बिना कुछ बोले ,जाने मंजिल भी नहीं मिलनी थी।
आखिर उसने राधेलाल के आगे चुप्पी तोडी ।संतो कहने लगी _भैया मैं यहां एक दम नई हूं।मुझे यहां के बारे में कुछ भी नहीं मालूम।
मेरा कोई घर बार नहीं है ।अगर कोई सर छुपाने की जगह मिल जाए तो मेहरबानी होगी ।
राधेलाल ने कहा ,मैं तुम्हारी स्थिति देख कर समझ गया था कि तुम अकेली और शहर से अनजान हो।
आओ,अभी तो फिलहाल मेरे साथ मेरे घर चलो ,फिर तुम्हारे रहने का कोई इंतजाम हो जाएगा तो तुम वहीं चली जाना।
राधेलाल ने उसका सामान उठाया और सामान लेकर आगे आगे चलने लगा ,संतो भी उसके पीछे पीछे चलने लगी।
राधेलाल ने टैक्सी ली।और वो संतो को लेकर अपने घर पहुंचा।
आसपास के लोग राधेलाल को सवाल भरी नजरों से देख रहे थे ,आज किस बेसहारा को ये राधेलाल लेकर आया है।
बिमला , ओ बिमला _पत्नी को पुकारते राधेलाल ने दरवाजा खटखटाया।
एक सुरुचिपूर्ण वस्त्र पहने प्रौढ़ा ,ने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला।
ये थी विमला ,राधेलाल की पत्नी ,संतो ने नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़ लिए ।
विमला ने राधेलाल से कहा _आज आने में देर कर दी।
राधेलाल ने कहा _हां ,विमला ये संतो है।ये बेचारी अकेली है, शहर में बिल्कुल नई ।
गांव की है ,बेचारी यहां क्या क्या हो सकता है ,अकेली महिला के साथ इसे नहीं मालूम ,किसी ऐसे वैसे के हाथ लग जाती ।इसलिए मैं यहां ले आया ।
कोई बात नहीं ,_विमला ने कहा।
मैं जब तक संतो को अंदर कमरा दिखाती हूं,आप नहा धो लीजिए ,मैं फिर खाना लगाऊंगी।
ठीक है ,सरकार जैसी आपकी इच्छा _राधेलाल ने हंसते हुए कहा।
राधे लाल का मकान दो कमरे का था ,एक कमरे में ही किचेन बना रखा था।उनके आंगन में ही एक फूल था ,कृष्णा।
छोटी सा हंसता खेलता परिवार,आमदनी ज्यादा नहीं थी तो अनावश्यक खर्चे भी नहीं करते थे ,ये दंपत्ति ।
विमला काफी मिलनसार और राधेलाल की तरह ही उसमें भी सेवा भाव कूट कूट कर भरा था।
ऐसे पति पत्नी बिरले ही मिलते हैं,ये संतो के किसी पुराने पुण्यकर्म का परिणाम था ,या उसकी जिंदगी के कांटों का एक एक होकर कम होने की शुरुआत ।
दो दिन बाद राधेलाल अपनी ड्यूटी पर चला गया।संतो ,विमला और उनका 8साल का बेटा कृष्णा घर में रह गए।
संतो ज्यादा कुछ बोलती नहीं,चुपचाप सारा घर का काम कर डालती ,विमला मना भी करती ,लेकिन संतो को तो इससे भी ज्यादा काम करने की आदत थी।
विमला प्यार से उसके दिल में पड़ी गांठों को खोल रही थी।इधर संतो के पेट आकर ले रहा था। छटवां महीना था।विमला को बहुत बार संतो कह चुकी थी कि ,उसके रहने के लिए अलग मकान देख दे,वो बोझ बनकर नहीं रहना चाहती ,लेकिन राधेलाल और विमला ने उसे हिदायत दी थी कि जब तक उसका बच्चा ना हो जाए और वो एक साल का नहीं होगा ,वो संतो को कहीं जाने नहीं देंगे।
संतो की पूरी देखभाल ,समय पर टीके लगवाने का काम सब विमला कर रही थी।
निश्चित अवधि पर संतो ने एक पुत्र को जन्म दिया ।नाम रखा नवनीत।घर में प्यार से सब दुलारे पुकारते।
राधेलाल और विमला बहुत ध्यान रखते ,संतो को ये सब देख बहुत बुरा लगता कि बेचारे कम तनख्वाह में भी किसी तरह उधार मांग कर घर चला रहे थे।
एक दिन हिम्मत करके उसने विमला से कहा भाभी मुझे आप कहीं रहने की जगह दिलवा दीजिए ,मुझे सिलाई आती है ,कुछ पैसे और गहने बेचकर में गुजारा कर लूंगी।
कृष्णा को भी तो भाभी अच्छी शिक्षा देनी है ,मैं नहीं चाहती मेरे और दुलारे की वजह से आपलोग अपने शौक और उसके बचपन से समझौता करें।
क्रमशः।

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