बनने चले थे हम कुदरत के नियंता और नियामक
पर जाने क्यों भूल गये थे एकांत स्वार्थ के मानक
पर वह क्या कोई मानव है जो, अपने में सबकुछ भर लिया
प्रकृति तो प्रकृति ठहरी खुद अपना संतुलन कर लिया l
उसे यकीन था हम नहीं कभी कर पायेंगे स्वच्छ धरा
जल, थल, पवन, वातावरण या फिर, चाहे हो अपना ही घर ही दूषित पड़ा
एहसान फरामोश जो ठहरे हम, आदत सी हो चली दूसरों पे छींटे उड़ाने की
छेद करना उसी थाली में, जो है खुद ही के खाने की
पर सुना है अब बाहर मलयानिल,भीनी सी सुगंध बिखराती है
थी मैली पतित सी,हो ध्वलित सब नद निर्झर, सागर से मिलने जाती है
उसे पता था कस नहीं सकते हम अपराधों की नकेल, क्योंकी
कभी उसने किसी दुः शासन को द्रोपदी की ओर, चीर बढ़ाते न पाया
लूटते-कटते और मिटते रहे, भीड़ से घिरे रहे लोग
पर हर बार हस्तिनापुर के दरबार सा रहा, मौन छाया
लेकिन अब सुना है राह में गिरे नोटो को भी, कोई कही नहीं उठाता है
सड़को पर पहले सा डर नहीं, हाँ, बस केवल सन्नाटा है
उसे लगा था वे नहीं जोड़ पाएंगे टूटे नाते
रोजमर्रा की आपाधापी में जो थे, हर रिश्तों से कतराते
बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम, बच्चों के लिए बोर्डिंग
और खुद के लिए भला, एकांत लगने लगा था
संबंधों को भी नफे-नुकसान के तराजू में तोलना,संभ्रांत लगने लगा था
पर क्या देखा की बैठ संग सब कुटुंब, आज फिर खिलखिला रहे हैं
अपना-पराया छोड़ हर ओर सहयोग हेतु, सहर्ष कर बढ़ा रहे हैं।
उसको हुआ महसूस समझेंगे नहीं कभी हम, भला कैसा रंज पिंजरे में बंद प्राणों को होता है?
देख पराधीन और बेबस से, फरफराते व्याकुल पंखों को आखिर हर तमाशबीन क्यों, इस कदर हैरत में खोता है ?
बलशाली दिखने की ऐसी चली थी कुछ परिपाटी
बल से गर न हो तो फिर छल से ही फांसो और चौड़ी कर लो अपनी छाती
पर आज घरों में बंद हमें पा, सब पंछी-पखेरू कुछ यूं हँसे
भई ये कोन सी तरकीब लगाई आज इंसानो, कि हम चले और तुम फंसे।
हो चला यकीन था न रुकेंगे कभी, बढ़ते अरमान हमारे
शानदार अपार्टमेंट, नित नए विलासिता के साधन और लंबी-चौड़ी चमचमाती कारे
और अधिक की ख्वाहिश में सुन्न पड़ने लगे थे गाँव, शहरों में बड़ा रेला था
क्योंकी भूख से बिलखने वालो के हिस्से का अन्न, वही कही नालों में उढेला था
अब सुना है गांवों कि ओर बढ़ चली है शहरी कतारे, कहते हुए कि रुखी-सुखी खाकर भी करेंगे अपने गाँव,अपने घरो में ही गुजारे।
था एतवार उसे न रहेंगी, जब कभी निश्चिंतताए
मानव फिर बन जाएंगे उस दिन हम, भरोसेमंद न रहेंगे जब, दरबाजे और हवाएं
पर सुनो प्रकृति, और खरीदने और पाने के अरमान अब भी हम में शेष है
जो बढ़ता ही जा रहा किसी वायरस के जैसा, ठीक वैसा ही जिद्दी और जानलेवा विशेष है
पर हाँ,कही से आकर उमड़-घुमड़कर,एक पहेली एक उलझन ने, जाने क्यों मन को छुआ
निर्णय ले कोई बतलाए "वायरस" अति घातक सा, पहले था या अब हुआ ?
निगम झा
एस. एस. बी. सब इंस्पेक्टर सिलीगुड़ी

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