लक्ष्मी के जन्म दिन का आयोजन कुछ के मन में प्रेरणा दे रहा था तो कुछ की जलन को बढा रहा था। गार्डन में एक कौने में कुछ स्त्रियां बैठी बात कर रहीं थीं। सभी अच्छे कपड़े पहने हुए थीं। खूब सिंगार पिटार किये हुए थीं। कहने को तो सभी सुदर्शन व सुलक्षणा की नजदीकी रिश्तेदार थीं। पर उनकी बातें तो कुछ अलग ही इशारा कर रही हैं।
" मुझे तो इस घर की लीला ही समझ नहीं आती। सुदर्शन भाई साहब बहुत सीधे हैं। ताऊ जी भी भजन पूजन में मग्न रहते हैं। घर में सुलक्षणा भाभी की ही चलती है। सारे फैसले वही लेती हैं। ताऊ जी और भाई साहब दोनों उसे मान लेते हैं। पर यह भी क्या बात है। घर तो आदमियों से चलता है। आदमियों में इतना बूता होना चाहिये कि औरतों को अपने हिसाब से चलायें। पर इन्हें समझाये कौन। जो समझाये, उसी को दुश्मन मान लेते हैं। हमने तो भाई, अब बोलना भी बंद कर दिया। "
शेष महिलाएं संध्या का समर्थन कर रही थी। वैसे संध्या जो सुदर्शन की मौसेरी बहन है, की बेटी को उसके ससुराल बालों ने घर से निकाल दिया। उसका मुकदमा भी सुदर्शन जी बिना फीस के लड़े थे। उन्होंने अपने कानूनी ज्ञान व अन्य तर्कों से भी लड़के बालों को झुकने पर मजबूर कर दिया था। आज उनकी बेटी भी अपनी ससुराल में अपने मन की मालकिन है। और इसके पीछे बहुत हाथ सुदर्शन का ही रहा है। पर दुनिया की यही रीत है कि लोग जिस बात को खुद के लिये सही समझते हैं, दूसरों की उसी बात की आलोचना करते हैं। अब उनकी बेटी की ससुराल में चल रही है तो ठीक। पर सुलक्षणा ने अपनी चलाकर भाई साहब का घर बर्बाद कर दिया।
" सही बोल रही है संध्या। अगर बच्चा ही गोद लेना था तो कितने रिश्तेदार तैयार थे। खुद मेने भी कहा था कि मेरे बेटी को गोद ले लो। पर गोद भी किसे रखा। जिसकी न जात मालूम। न जिसके माॅ बाप के कर्मों का पता। उसे दुनिया को अपनी बेटी बताते फिरते हैं। देखना एक न एक दिन इनके मुंह पर कालिख मल जायेगी। माता पिता के संस्कार बच्चों में आते ही हैं। " शारदा जी इस तरह बोल रही थीं जैसे वह वास्तव में माॅ शारदा हैं। उनके मुख से निकली बात सच ही होगी। हालांकि शारदा जी का पुत्र इस समय जेल में है। उसपर अपनी ही बहन की आनर किलिंग मामले में हत्या का आरोप है। कहने बाले तो यह भी बोलते हैं कि बेटी की हत्या में पूरा घर शामिल था। पर बेटे ने अपराध स्वीकार कर सभी को बचा दिया। नाबालिग बेटा तीन साल में छूट आयेगा। यदि खुद जेल जाते तो शायद पूरी जिंदगी जेल की चक्की चलाने में गुजर जाती।
कितनी ही महिलाओं को याद आने लगा कि सुदर्शन व सुलक्षणा ने उनके बेटे को गोद लेने से मना कर दिया था। आज जो शानशौकत की जिंदगी एक अनाथ लड़की जी रही है, उसपर उनके बेटे का हक था। मन में नफरत की आग सुलगने लगी। यदि बद्दुआओं में इतनी ताकत होती कि किसी के जीवन को नरक बना सकें तो आज शायद इतनी बद्दुआएं लक्ष्मी का जीवन ही बिगाड़ देतीं।
अचानक से संध्या ने कुछ इशारा किया। सामने रुक्मिणी खड़ी थी। वैसे तो रुक्मिणी घर की नौकरानी ही थी। पर भाई साहब ने उसे भी ज्यादा सर चढा रखा है। एक तरफ रिश्ते की बहनों को पूछते नहीं हैं, दूसरी तरफ एक नौकरानी को बहन बना रखा है। लगता है कि रुक्मिणी ने कुछ तो सुन लिया है। वैसे नौकरों के मुंह नहीं लगना चाहिये। पर इस समय हालात कुछ अलग हैं। अगर रुक्मिणी ने भाई साहब से कुछ बोल दिया तो अभी सुलक्षणा भाभी हमें बेइज्जत कर घर से बाहर निकाल देंगीं। भाई साहब व ताऊ जी कोई भी उन्हें रोक नहीं पायेगा। फिर भाई साहब से हजारों काम बनते हैं। उनसे जरूरत पर कुछ ले लिया तो कभी भी उन्होंने वापस करने का तकादा नहीं किया। फिर जरूरत तो रोज ही आती रहती हैं। यदि लड़की का मुकदमा कोई और बकील लड़ता तो वह भी अच्छी फीस लेता। मौके की नजाकत यही है कि अभी रुक्मिणी को चुपचाप मना लिया जाये।
" अरे रुक्मिणी। आओ बैठो। हम तो आपको कभी कम नहीं समझते। पर आप ही न जाने क्यों हमसे दूर रहती हों।"
" नमस्ते जीजी। दूर तो इसलिये रहती हूं कि आप व्यवहार के लायक ही नहीं हो। यह तो भैय्या और भाभी की भलमनसाहत है कि सब जानते हुए भी आप सबकी मदद करते हैं। पर लक्ष्मी मेरी भी बेटी जैसी है। उसे मेने पाला है। अगर फिर आपके मुंह से लक्ष्मी के खिलाफ कुछ सुना तो समझ लेना कि बेइज्जती कर भाभी आपको यहां से बाहर नहीं निकालेंगी बल्कि मैं निकाल दूंगी। इतना याद रखना कि मुझे कोई भी नहीं रोकेगा। न भेय्या और न ताऊ जी। अच्छी बात है कि खुशी खुशी खाना खायें। और अपने घर का रास्ता नाप लें। मैं सब कुछ सहन कर सकती हूं पर लक्ष्मी के खिलाफ एक शव्द भी नहीं। जितना दूसरों के घरों में ताकझांक करती हों, उतनी अपने घर में करतीं तो खुद के घर में यह हाल न होते। भैय्या और भाभी ने लक्ष्मी को न केवल पुत्री का प्रेम दिया है, बल्कि उसे सारे अच्छे संस्कार दिये हैं जो माता पिता का फर्ज है। लक्ष्मी अपने मन को भी भैय्या भाभी के मन के लिये मार सकती है। लक्ष्मी के विषय में इतना विश्वास से इसलिये भी कह रही हूं कि मेने उसे पाला है। आखिर मैं भी उसकी माॅ हू। "
इतने समय से बात बना रहीं स्त्रियों के मुंह पर ताला लग गया। कोई भी सुदर्शन और सुलक्षणा से संबंध खराब नहीं करना चाहती थीं। घर की एक नौकरानी के सामने इस तरह फटकार खा रही थीं जैसे रुक्मिणी मालकिन और वे सब नौकरानी हों। गनीमत की बात इतनी थी कि बात सुदर्शन या सुलक्षणा को पता नहीं चली।
रुक्मिणी वापस मुड़ी ही कि शारदा उसके बहुत पास आ गयी। धीरे धीरे गिड़गिड़ा कर माफी मांगकर प्रार्थना करने लगी कि वकील साहब को कुछ न बताये। स्वार्थ बुद्धि के लोग जितनी जल्दी विरोध करते हैं, उतनी ही जल्दी मनुहार भी करते हैं। हालत तो यह थी कि इस समय रुक्मिणी उन्हें अकेले में ले जाकर कान पकड़कर उठक बैठक करने को कह देती तो भी शायद कोई प्रतिरोध करती। स्वार्थी लोगों का न तो प्रेम स्थायी होता है और न नफरत। स्थायी होता है तो बस स्वार्थ। जिसके लिये आसानी से गधे को बाप बनाया जा सकता है और सगे बाप की भी उसे गधा मानकर उपेक्षा की जा सकती है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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