कल तक सुप्त पड़े थे  बीज में,
नई  पौध  बन  तुम  उग  आये।
अंडरूप  बीज   में  तप   करते,
ऋषि सा तप में तुम सफल हुये।।

धरा  के  गर्भ में  मिला   तुझको,
ऊष्मा  और  ममता  माता   का।
बादल  बरस  सींच  धरती   को,
कियाअंकुरित तुझको पिता-सा।।

नन्हें    दोनों    बाँह    फैलाये,
मंद   पवन   के   संग    झूमे।
सिर  आहिस्ता  उठाया  तुमने,
प्रथम रश्मि दिनकर का देखने।।

उठ खड़े हुए तुम कुछ दिन में,
ज्यों  तुम  छाता ताने  नभ में।
वामन -सा  तुम  बढ़े गगन में,
परमारथ हित तुम कुछ करने ।।




नई पौध तुम अगर शस्य हुये,
लोगों को  अन्न तुम देते  हो।
अगर फलों के वृक्ष कभी  हुये ,
तो  मीठा  फल  तुम देते  हो।।

अगर औषध वनस्पति तुम हुये,
धन्वंतरि- सा  औषधि  देते  हो।
अगर इक वन्य वृक्ष  ही तुम हुये,
परिशुद्ध    पर्यावरण   देते   हो।।

जीवन  तेरा   संत   के    जैसे,
परहित  में  ही  तुम  जीते  हो।
जीवित  रह    छाया  तुम  देते,
फिर  बहुमूल्य  काष्ठ  देते  हो।।

नई  पौध तुम जग में  आये,
परहित में जीवन तुम  जीते।
बीजरूप में  तुम -सा कितने,
नये  पौध फिर  तुम दे जाते।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती    "दिवाकर "