ऊपर चढने का मार्ग बहुत कठिन है। थोड़े दिनों की बात अलग है। कुछ ही दिनों में अनेकों व्यवधान आने लगते हैं। पहले मन ही सुख सुविधाओं की तरफ भागता है। पर जो अपने प्रेम का ही बलिदान कर दे, वह मन को भी वश में करना जानता है। बचपन से ऐशोआराम की जिंदगी जीता आया विशाल अब अभावों में जीवन जीने का अभ्यास करने लगा। मनुष्य को जीने के लिये बस रोटी, कपड़ा और मकान ही तो चाहिये। उसके लिये ज्यादा मेहनत करने की क्या आवश्यकता है। जीव का मुख्य ध्येय तो परमात्मा में विलय ही है। इसके अनेकों साधन बताये गये हैं। किसी भी साधन को किसी दूसरे साधन से कम नहीं कहा जा सकता है। विशाल मानव सेवा का आसरा लेकर कर्मयोग की राह पर चलने लगा। इसमें अब उसे कोई परेशानी नहीं महसूस होती। पर अब उसके पिता डाक्टर नामदेव और माता सुनीता को परेशानी होने लगी। आखिर कोई माता पिता कैसे सहन कर सकता है कि उनका पुत्र पूरे जीवन के लिये सुखों का त्याग कर दे। अभावों में जीवन जीये। जीवन पथ पर अकेले यात्रा करे।
यदि पुत्र ही सुखों से बंचित रहे तो माता पिता को भी सुख कचोटने लगते हैं। सुखों में भी दुखों की अनुभूति होने लगती है। सच्ची बात तो यह है कि जिन्हें मनुष्य सुख समझता है, वह तो इंद्रियों के विकार हैं। यदि इन्हीं में सुख होता तो भला अनेकों राजा और राजकुमार भला क्यों उनमें लात मार कर वैराग्य की राह पर चल दिये। विशाल अपने जीवन में सुखी है पर डाक्टर साहब और सुनीता जी को लगता कि उनका पुत्र बहुत दुखी हैं। शायद यही मोह है।
वैसे तो मोह अधर्म का मूल है। मोह में पड़कर मनुष्य कितने पाप करता है। पर कभी कभी मोह भी जीवन को राह दिखा जाता है।
जिन पिता और पुत्र के मध्य कभी मतभेद नहीं हुए, आज दोनों के विचारों में बहुत अंतर था। पिता द्वारा भेजी गयी धनराशि को विशाल ने स्वीकार करने से मना कर दिया। खुद को अस्पताल से जो साधारण वेतन मिलता है, उसमें से भी बहुत वह मानव सेवा में लुटा देता है।
वैसे अस्पताल में अनेकों डाक्टर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पर उनमें से ज्यादातर तो वही है जिन्होंने अपने जीवन का आरंभिक भाग व्यतीत कर लिया है। जीवन में काफी अर्थ कमाया है तथा जब जीवन का अवसान नजदीक है तो किसी भगवत्प्रेरणा से मन में ललक उठ गयी कि परमार्थ भी संवारा जाये। जीवन के अंतिम समय में भी परमार्थ की बातें मन में आना भी ईश्वर की कृपा माना जाता है। जीवन की नश्वरता जिस समय समझ में आ जाये, तभी मनुष्य कल्याण के पथ पर बढ लेता है।
कुछ डाक्टर वे हैं जो अभी पढकर निकले हैं। डाक्टरी का अनुभव लेकर जल्द किसी अच्छे वेतन पर चले जायेंगें। केवल विशाल सभी से अलग है। अभी उसके जीवन का आरंभ ही माना जायेगा। फिर भी वह अच्छे वेतन को छोड़कर मानव सेवा कर रहा है।
आखिर डाक्टर नामदेव और सुनीता जी वृन्दावन घूमने के बहाने से विशाल को समझाने आये।
" अब तो तुम्हें कभी अपने पिता की याद भी नहीं आती। पिता तो रहने दो, कभी माॅ का दुख समझने की कोशिश नहीं की।"
डाक्टर साहब के स्वर में ताना ही अधिक था।
" ऐसा तो नहीं है। मरीजों के इलाज से फुर्सत नहीं मिलती। फिर भी हर रोज माॅ से बात हो जाती है।" विशाल ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया। डाक्टर नामदेव देख रहे थे कि अब उनका पुत्र ज्यादा ऊचाई पर पहुंच चुका है। तो उसे अपने बराबर लाने के लिये धर्म और अधर्म की अपने तरीके से व्याख्या करने लगे।
" ठीक है कि तुमने अपने प्रेम के लिये त्याग किया। इस बारे में हमें तुमपर गर्व है। पर क्या तुम्हें अपने माता पिता से प्रेम नहीं। तुम्हें इस तरह अभावों में जीवन जीता देख हम कितने दुखी होते हैं। हमारी भी तुमसे कुछ अपेक्षाएं हैं। तुम हमारे इकलौते पुत्र हो। क्या तुमने पित्र ऋण चुकता कर दिया है। "
वैसे डाक्टर साहब को पित्र ऋण की कोई जानकारी नहीं थी। पर जब मनुष्य अपना मकसद हल करने निकलता है तो कुछ पढकर ही निकलता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार जो भी संसार में आता है, वह पितरों का ऋण लेकर ही आता है। ईश्वरीय सृष्टि में अपना योगदान देकर ही वह उस ऋण से मुक्त हो पाता है। किसी को कोई शारीरिक असमर्थता हो तो अलग बात है।
डाक्टरी की पढाई में विशाल ने कभी इन बातों को पढा ही नहीं था। उसकी नजर में तो उसके जीवन का उद्देश्य उसे मिल चुका है।
" माॅ। आप क्या चाहती हो। अब मुझे तो मेरे जीवन का आधार मिल चुका है। क्या मेरा निश्चय आपको पीड़ा पहुंचा रहा है।"
सुनीता जी डाक्टर साहब के सापेक्ष ज्यादा समझदार महिला हैं। वह जान चुकी हैं कि अब विशाल को वापस नहीं ला सकते। वैसे वह उनके कहने से वापस आ जायेगा। पर फिर वह खुद से ही दूर चला जायेगा।
" बेटा। तुम अपना जीवन जैसे भी बिताओ। पर विवाह कर लो। तुम्हारा अकेला जीवन हमें दुखी करता है। खुद के लिये न सही पर हमारी खुशी के लिये ही सही। तुम अपनी माॅ से बहुत प्रेम करते हों। तुम यह भी जानते हों कि प्रेम में खुद की इच्छा का कोई महत्व नहीं है। इस समय हमारी इच्छा को मान दो। क्या तुम अपनी माॅ के लिये इतना भी नहीं कर सकते। "
जब मनुष्य धर्म की राह पर चलता है तभी उसके सामने ऐसी स्थितियां आ जाती हैं कि मनुष्य को एक बार फिर से विचार करना होता है। प्रेम के लिये त्याग करना बहुत कठिन है। पर विशाल ने वह कर दिखाया। अब प्रश्न यह है कि क्या वह अपने माता पिता से प्रेम नहीं करता। क्या किसी लड़की से हुआ प्रेम, उसके मन में माता पिता के प्रेम से बढकर हो सकता है। निश्चित ही नहीं। पर दूसरा सत्य यह भी है कि वह अपने जीवन के आदर्शों को गिरा नहीं सकता है। उसके आदर्शों में उसका साथ दे सके, ऐसी लड़की का मिलना भी अति कठिन है। विवाह के बाद पत्नी की इच्छा का भी सम्मान देना होगा। और यदि पत्नी की इच्छा ही इतना ऊंचा आदर्श न हो तो फिर वही संसार चक्र शुरू हो जायेगा, जिससे वह बहुत ऊपर उठ चुका है।
" ठीक है माॅ। पर मैं उसी लड़की से विवाह करूंगा जो मेरे राह का अवरोध नहीं बनेगी।"
डाक्टर नामदेव और सुनीता जी कुछ संतुष्ट हुए। चलो लड़का विवाह तो कर ही लेगा। उसे जैसी लड़की चाहिये, उसी से विवाह कर ले। एक बार फिर से उसके जीवन प्रेम से भर जायेगा।
पर दूसरी तरफ दिक्कत भी थी। आखिर विशाल का सहयोग करने बाली लड़की मिलेगी कहाॅ। सभी को सुख सुविधाएं ही पसंद हैं। भला कौन अपने सुखों पर लात मार सकता है।सुखों पर लात मारना तो प्रेमियों का ही काम है। लक्ष्मी ने संकल्प के लिये सुखों को ठुकराया। तो विशाल ने लक्ष्मी के स्वप्न को अपने प्रेम का भी बलिदान देकर पूर्ण किया।
विशाल विवाह केवल उसी लड़की से कर सकता है जो उसके साथ कठिनाइयों की राह पर हसते हूए चल सके। यह तभी संभव है, जबकि कोई अपने सपनों में विशाल को वही स्थान दिये हुए हो जो लक्ष्मी ने अपने सपनों में संकल्प को दिया था। जो स्थान संकल्प के सपनों में लक्ष्मी का था। तथा जिस तरह सपनों में लक्ष्मी को स्थान देकर विशाल आज इस राह पर चल दिया है। कह सकते हैं कि डाक्टर नामदेव और सुनीता जी का विशाल के जीवन के लिये देखा जाने बाला स्वप्न किसी अज्ञात लड़की के स्वप्न पर आश्रित है। विशाल को ऐसा कुछ याद नहीं है। पर कोई है जो कभी विशाल को मन की बात बोल नहीं पायी। आज भी वह अपने मन मंदिर में विशाल की आराधना करती है। आज भी विशाल उसके सपनों में आता है। कोई है जो विशाल का साथ देने के लिये सारे सुखों से मुंह मोड़ सकती है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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