अमीर खुसरो की फारसी में एक गजल है
मन  तू  शुदम, तू मन शूदी
मन तन शुदम, तू जान शुदी।
ता कस न गूयद बाद
अजीं मन दीगरम तू दीगरी।

अर्थात मैं तू हो गया,और तू मैं हो गया।मैं बदन हो गया, तू जान बन गया,अब किसकी मजाल ये कहे कि मैं और हूं।

कुछ ऐसे ही प्रेम में डूबे दो मस्ताने ,राजा इंद्रजीत और राय प्रवीण जिनके प्यार के महक पूरे फिजाओं में फैली थी।

16 सदी का भारत , ओरछा बुंदेला  राजाओं की कर्म भूमि ।
राजा मधुकर शाह के तीन पुत्र वीर सिंह,इंद्रजीत,और राम सिंह ने।मधुकर शाह ने तीनों को अलग अलग जागीरें दे दी थी।

एक बार इंद्रजीत अपने जागीर के दौरे पर थे,वहां एक लड़की को सुरीला भजन गाते वो मुग्ध हो गए,और उसके पिता से अनुमति ले ,महल में उसकी शिक्षा का प्रबंध कर दिया।
उस गरीब पुनिया की शिक्षा उस दौर के मशहूर कवि केशव के सानिध्य में कर दिया गया।
अब पुनिया ,पुनिया नहीं राय प्रवीण के नाम से नवाजी गई।
सुंदरता,नृत्य गायन,में उसका कोई सानी नहीं था।उसके रूप रंग,कला,और प्रेम के चर्चे दूर दूर तक फैल गए।

इंद्रजीत के महल की शान थी वो ,और उनके दिल पर राज करती थी।उन्होंने अपने महल के परिसर में ही राय प्रवीण का भी महल बनवा दिया ।
"राय प्रवीण की खूबसूरती की खबर अकबर तक पहुंच गई थी।"

(दीवाने खास में राजा इंद्रजीत अपने मंत्रियों,सेनापति के साथ राज्य की उन्नति पर चर्चा करने बैठे ही थे )

तभी प्रहरी का प्रवेश होता है_
राजा इंद्रजीत की जय हो ,बादशाह अकबर के दरबार से दूत आया है।

उन्हें आदर के साथ दरबार में लाया जाए_राजा इंद्रजीत ने आदेश दिया।

दूत दरबार में प्रवेश करता है।
कहो क्या पैगाम लाए हो_राजा इंद्रजीत ने कहा।
राजा इंद्रजीत की जय हो,मुगलिया सल्तनत के नूरे नजर जिल्ले इलाही बादशाह अकबर का फरमान है कि_

",हम हीरों के पारखी हैं,हमारे दरबार में खूबसूरती,और कला को हमेशा से  तवज्जो दी जाती है,इसलिए आपके दरबार की मलिकाए  हुस्न,मशहूर अदाकारा ,खातून राय प्रवीण को दरबार में भेजने का हुक्म दिया जाता है।
हुक्म की तामील जल्द से जल्द की जाए।

दूत ने बादशाह अकबर का पैगाम सुना दिया।
दरबार में सभी सन्न रह गए।राजा इंद्रजीत की मुट्ठियां भिंच गईं।

उनकी इस हालत को देख महामंत्री ने दूत को कुछ समय के लिए बाहर जाने का इशारा किया ।

विचार विमर्श शुरू हो गया,सभी की एक राय थी कि हम बादशाह से टक्कर नहीं ले सकते ,राय प्रवीण को वहां भेज दिया जाए।

लेकिन राजा इंद्रजीत को किसी की कोई बात सुनाई नहीं दे रही थी,उसका सर भिन्ना रहा था,ऐसा लग रहा था कि उसका सर फट जाएगा।
दूत को जाने का कह ,सभा स्थगित कर दी गई।
(इंद्रजीत  का रथ ,राय प्रवीण के महल की ओर चला)
राजा साहब पधार रहे रहें_दासी ने जाकर राय प्रवीण को खबर दी।

राय प्रवीण दौड़ी दौड़ी उनकी अगवानी को अपने कक्ष से बाहर निकली।
इंद्रजीत कक्ष में आए,राय प्रवीण ने सभी दासियों को बाहर जाने का इशारा किया।

पूर्णतः एकांत था।इंद्रजीत के लिए जाम बना कर राय प्रवीण ने पेश किया।
क्या बात है ,आज आपकी तबियत नासाज है ? नृत्य ,गायन पेश करूं?
मैंने उड़ती उड़ती खबर सुनी थी ,क्या अकबर बादशाह का दूत दरबार में आया था,_बात बढ़ाते राय प्रवीण ने पूछा।

मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें अपने से अलग नहीं कर सकता , तुम मेरी आत्मा में बसती हो ,तुम्हारे बिना मेरा कोई वजूद नहीं ,तुम मेरा अभिमान हो और इसके लिए चाहे मुझे अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े ,मैं जान देने को तैयार हूं। मेरा इरादा अटल है_इंद्रजीत ने गुस्से से कहा।

तो क्या एक नाचीज के लिए आप खून खराबा करवाएंगे,कितनी स्त्रियों के मांग का सिंदूर मिटवा देंगें।
आपके और इस राज्य के बहुत अहसान हैं मुझ पर,जिसे मैं मर कर भी नहीं चुका सकती । ,आप मुझसे अलग नहीं हैं ,हमारा प्यार सच्चा है ,मुझे अपने आप पर और अपने प्यार पर पूर्ण विश्वास है।आपको मेरी कसम आप मुझे रोकेंगे नहीं।


इंद्रजीत का मन कोई  भी तर्क  मानने को तैयार नहीं था।

(बादशाह अकबर का दरबार)
दूत का प्रवेश
क्या खबर लाए हो?_अकबर ने प्रश्न किया।
जिल्लेइलाही जान की मुआफी, राजा इंद्रजीत ने समय मांगा है ,सोचने को_दूत ने डरते डरते बताया।
(ओरछा _दीवाने खास)

बादशाह अकबर ने हमारे राज्य पर  राय प्रवीण को भेजने में देरी करने के कारण 1 करोड़ का जुर्माना लगाया है।_महामंत्री ने सूचना दी। 

(राय प्रवीण का प्रवेश,दीवाने खास में)
राजा इंद्रजीत की जय हो,मेरी पालकी तैयार है ,अनुमति प्रदान करें।

राजा इंद्रजीत ने सहमति में सर  हिलाया,उसका शरीर में जैसे जान ही न बची हो।
(राय प्रवीण की पालकी आगरा के लिए  प्रस्थान हुई)

राय प्रवीण अकबर के दरबार में हाजिर हुईं।
अकबर ने उसकी खूबसूरती की चर्चा जितनी सुनी थी ,राय प्रवीण उससे भी  कहीं ज्यादा खूबसूरत थी, उसके आगे अजंता एलोरा की मूर्तियां कुछ भी नहीं थीं।

अकबर उसे मंत्रमुग्ध सा देखता रह गया।
उसने कहा _कुछ सुनाओ,मैने तुम्हारे नृत्य,और गायन की बहुत चर्चा सुनी है।

प्रवीण ने अपने गुरु के साथ एक दोहा पेश किया
विनीत राय प्रवीण की,सुनिए साह सुजान
जूठी पातर भखत है, बायस,बारी स्वान।

पूरा दरबार इस दोहे को सुन स्तब्ध रह गया।कहने का आशय था कि जूठी पत्तल का खाना कुत्ते,और कौवे ही खाते हैं।

अकबर अत्यंत क्रोधित हुआ ,उसने कहा _तुम्हारी इतनी जुर्रत,तुझे पता भी है,की तू किसके सामने और क्या कह रही।

महाराज मैंने अपना तन मन ,अपना जीवन इंद्रजीत को सौंप दिया है। मैं उन्हीं से प्रेम करती हूं।

अकबर इस बात से प्रभावित हुआ ,और उसने ओरछा का जुर्माना भी माफ़ कर दिया और ससम्मान प्रवीण को वापस भेज दिया।


लेकिन हर  प्रेम हमेशा अधूरा ही रहकर ,इतिहास में जगह पाता है।
राजपरिवार को राय प्रवीण से इंद्रजीत का विवाह मंजूर नहीं था।
राजा मधुकर शाह की तरफ से राय प्रवीण का विवाह अन्यत्र कराने का प्रयास होने लगा। 
अंत  में राय प्रवीण ने अपनी जान दे दी।इंद्रजीत ,राय प्रवीण के गम में पागल हो गए ,और साल भर के अंदर ही उनकी भी मृत्यु हो गई।
बेतवा का किनारा,खूबसूरत प्राकृतिक  वातावरण ,रामराजा मंदिर ,वनों ,महल, छतरियों से समृद्ध ओरछा ,गवाह है इस अधूरे प्रेम का ।एक राजा और नृत्यांगना का प्रेम जो अधूरा ही रह गया।