हाँ मैं तवायफ हूँ,
हूँ मैं एक तवायफ
हूँ जैसी भी
एक चरित्र रखती हूँ।
धोखा नहीं देती
भूख के खातिर
जिस्म को बेचती हूँ।
आते हैं कुछ उजले तन
मन काला लेकर
खेल गात से मेरे
दाम पटक जाते हैं।
सत्चरित्र सभ्य
उजले सूरज की रोशनी में
चन्द्रमा की चाँदनी में
मुँह काला कर जाते हैं।
हाँ मैं.......
कौन हूँ कैसी हूँ क्यों नर्क में हूँ
कोई नहीं देखता है।
नजर हर किसी की बस
रंगे पुते बदन को निहारती हैं।
ख़रोंच मेरी काया की नजर नहीं आती हैं।
छुपा लेती हूँ उन्हें भी
आँसुओं की तरह
तैयार हो जाती हूँ फिर
अगली रात के लिए.....।
हाँ मैं......
कई बार लगता हैं
मोल मेरा
जिस्म का वजन देख
सामान की तरह
बेपर्दा होती हूँ
सफेद पोशों के सामने
जो खा जाते हैं
मेरे गोरे जिस्म के अंगों को
धुनते हैं मुझे रोज
और गुणगान करते हैं
मेरे उभरे उरोजों का।
हाँ.........
जैसी भी हूँ
एक चरित्र रखती हूँ।
समाज के लिए
अपवित्र पर
मन से पवित्र
रहती हूँ।
कुछ गंदे लोगों का
मैला रोज ढोती हूँ।
सह जाती हूँ,
हर पीड़ा,
हर दर्द
सिसकियों को दबा जाती हूँ
हाँ मैं तवायफ हूँ
पर तवायफ
मन से नही बनती हूँ।

गरिमा राकेश गौत्तम
कोटा राजस्थान