युद्ध के परिणाम  वीभत्स हो गए,
जीत कर भी मन अतृप्त रह गए।

बजती दुंदभी, नगाड़ों की आवाजें,
चोट ह्रदय के बीच कर गए।

विजय की पताकाओं  के वर्ण धुंधला गए,
रक्त के मन्जर नजर में भर गए।

कुछ भी कोई न पा सका विनाश के सिवा,
बस दिखाबे को विकसित हो गए।

न उठाते अस्त्र पार्थ कभी जो बात होती राज्य वैभव की,
बात थी धर्म की तब ही तो कृष्ण सारथी बन गए।

हो सके जब तक सम्भव टालो युद्ध  की स्थिति,
पर इतना भी नहीं कि कायर बन गए।

हो सके उतना सहो, न द्रोपदी लगाओ दाँव पर,
बाद में उठाया शस्त्र, क्यों ,दुशासन  चीर हरण कर गए।

युद्ध सुख सौभाग्य, लेकर आता कभी नही,
गुलामी के जीवन से बेहत्तर है वो जो लड़कर मर गए।

युद्ध हो, मन का, या घर का, या देश, प्रदेश का,
कितने मन झुलसे, कितने तन जीते जी मर गए।

जब होते युद्ध विराम छोड़ जाते पीड़ा गहन,
न हो कभी कोई युद्ध अगर जन बैठकर चिंतन कर गए।युद्ध के परिणाम  वीभत्स हो गए,
जीत कर भी मन अतृप्त रह गए।

बजती दुंदभी, नगाड़ों की आवाजें,
चोट ह्रदय के बीच कर गए।

विजय की पताकाओं  के वर्ण धुंधला गए,
रक्त के मन्जर नजर में भर गए।

कुछ भी कोई न पा सका विनाश के सिवा,
बस दिखाबे को विकसित हो गए।

न उठाते अस्त्र पार्थ कभी जो बात होती राज्य वैभव की,
बात थी धर्म की तब ही तो कृष्ण सारथी बन गए।

हो सके जब तक सम्भव टालो युद्ध  की स्थिति,
पर इतना भी नहीं कि कायर बन गए।

हो सके उतना सहो, न द्रोपदी लगाओ दाँव पर,
बाद में उठाया शस्त्र, क्यों ,दुशासन  चीर हरण कर गए।

युद्ध सुख सौभाग्य, लेकर आता कभी नही,
गुलामी के जीवन से बेहत्तर है वो जो लड़कर मर गए।

युद्ध हो, मन का, या घर का, या देश, प्रदेश का,
कितने मन झुलसे, कितने तन जीते जी मर गए।

जब होते युद्ध विराम छोड़ जाते पीड़ा गहन,
न हो कभी कोई युद्ध अगर जन बैठकर चिंतन कर गए।



अन्जू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।