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🌹जाती हूं,
तेरा घर छोड़ मां,
🌹आजीवन रहेगा,
तेरा असर मां।
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💕मेरी मां....
* सुबह की अलार्म की तरह ,जगाती भी थी,
* न जागो तो, बाल सहला कर मुस्कुराती भी थी।
* गृहस्थी के काम हेतु फटकार लगाती भी थी,
* यदि करूं तो स्वयं मुझे वहां से हटाती भी थी।
💕मेरी मां...
* मुझे स्कूल पंहुचाने जाती भी थी,
* छुट्टी के समय पे राह तकते आती भी थी।
* टिफिन भूल जाने पर विशेष कुछ बनाती भी थी,
* और दौड़ी दौड़ी आके हमें दे जाती भी थी।
💕मेरी मां....
* स्वयं ही मुझे नहलाती खिलाती भी थी,
* और स्वलंबी बनने की सीख सिखाती भी थी।
* रात को लोरियों में कहानी गा सुलाती भी थी ,
* और जीवन इतना सरल नहीं है ये सिखलाती भी थी।
💕मेरी मां....
* मेरे बीमार होने पर रातों को जाग कर बिताती भी थी,
* ठीक हो जाने पे सदैव डांट पिलाती भी थी।
* मेरे हल्के खरोंच से बहुत घबराती भी थी,
* पर "ये तो होता रहता है" कह बहादुर बनाती भी थी।
💕मेरी मां....
* पढ़ने लिखने के लिए समझाती भी थी,
* और जीवन के पाठ खुद पढाती भी थी।
* छोटे बड़े का भेद का एहसास मुझे कराती भी थे ,
* और स्वयं मुझे सबसे विशेष बनाती भी थी।
💕मेरी मां....
* ठंड की रातों में सीने से मुझे लगा सो जाती भी थी,
* मेरे सो जाने पे रजाई ओढ़ा किनारे हो जाती भी थी।
* मुझे सर्वगुण संपन्न सभी में दर्शाती भी थी,
* "इसे कुछ नहीं आता है" ये कह के रुलाती भी थी।
💕मेरी मां....
* पराया धन बिना कहे मुझे जताती भी थी,
* और मेरे विछोह की पीड़ा उन आंखो को छलकाती भी थी।
* आंखो के जल को मुझसे छिपाती भी थी,
*पुनः मेरे बालो को संवार इतराती भी थी।
💕आज मां....
* मुझे ससुराल विदा कर नीर बहाती भी है,
* पर मुझे अपने घर जाता देख के मुस्कुराती भी है।
* आज भी, यूं तो मुझे संवारती सजाती हैं,
* पर मेरी मां,
तू ही सबसे ज्यादा रूपवान मेरे हृदय में विराजती है।
💕मेरी मां....
*अब जब भी तेरे आंचल में आऊंगी ,
* सच कहूं मेरी मां सकून की नींद तभी पाऊंगी...।
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स्वरचित व मौलिक
कीर्ति रश्मि "नन्द
वाराणसी

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