५ और ६ अगस्त २०१९, इन दो दिनों में भारत की संसद में जो हुआ वह कई लोगों के लिए कष्टकारक था, विशेषकर उन लोगों के लिए जो भारत को खंडित करना चाहते थे।  देश के गृहमंत्री ने संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन(संशोधित) विधेयक २०१९ प्रस्तुत किया था। इस विधेयक का उद्देश्य था जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद ३७० रद्द करना। राज्यसभा में तो यह लंबी चली बहस के बाद बहुमत से पारित हो गया लोकसभा में पारित होना शेष है।
    दिल्ली से दूर बैठे भारत विरोधी कुछ लोग भी टीवी के माध्यम से इस ऐतिहासिक घटना के साक्षी बन रहे थे, ६ अगस्त को लोकसभा में गृहमंत्री जी ने जब अपने भाषण में यह कहा, " जिस दिन इस विधेयक पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाएंगे और यह गजट में छप जाएगा उस दिन से जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० के खण्ड १ को छोड़कर शेष खंड लागू नहीं होंगे।"  तब इन सभी को विश्वास नहीं हुआ, उनके लिए यह किसी आघात से कम नहीं था। उन्होंने जिस स्वप्न के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया था वह अब टूटता दिख रहा था।

    गृहमंत्री के कहने का आशय था कि भारत और जम्मू-कश्मीर के मध्य अलगाव उत्पन्न करने वाले इस अनुच्छेद का अस्तित्व अब समाप्त हुआ, इसी विधेयक ने राज्य को मिला विशेष दर्जा समाप्त कर दिया और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों; जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर दिया।

  अब यह तो भविष्य ही बताएगा कि सरकार का यह निर्णय राज्य के लिए हितकारी है या नहीं; पर एक बात तो स्पष्ट है, इससे कश्मीर में रहने वाले भारत से कश्मीर को अलग करने की मंशा रखने वाले, गजवा-ए-हिन्द का स्वप्न देखने वाले तनिक भी प्रसन्न नहीं थे।
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   पाकिस्तान में पर्वतीय क्षेत्र में कहीं एक गाँव था जिसकी स्थिति देखकर पता चलता था कि यहाँ कोई नहीं रहता है, तो फिर यह कौन है जो अपनी दो एसयूवीज के साथ इसी गाँव की ओर बढ़ रहा है? दोनों गाड़ियाँ गाँव के एक बड़े परिसर वाले घर के अंदर जाकर रुक गईं पहली गाड़ी से एक व्यक्ति उतरा उसकी चाल ढाल से लग रहा था कि वह किसी विभाग का बड़ा अधिकारी है, उसके साथ उतरे लोगों को उसने कुछ निर्देश दिए जिसके बाद अपने साथ दो लोगों को लेकर घर के अंदर घुस गया।

  बाहर से निर्जन दिखने वाला यह घर अंदर लोगों से भरा हुआ था, बिना वर्दी के हथियार पकड़े इन लोगों को देखने से ही पता चलता था कि यह लोग आतंकवादी हैं। शायद यह इनका कोई गुप्त ठिकाना है। 

"आइए जनाब बदरुद्दीन यूनाइटेड जिहाद कॉउन्सिल के लोग आ चुके हैं, आप ही का इंतज़ार हो रहा है", उस व्यक्ति का स्वागत करते हुए एक दूसरे व्यक्ति ने कहा।

"माफ करना आदिल भाई कच्चे रास्ते के कारण जरा देर हो गई", बदरुद्दीन ने उससे गले लगते हुए कहा। 

    मेल-मिलाप के बाद दोनों लोग ऊपर प्रथम तल में बने एक कमरे में चले गए जहाँ पहले से ही चार लोग बैठकर आपस में कुछ बातें कर रहे थे, उनकी बातें सुनकर लगता है कि वे कोई आतंकवादी हमला करने की योजना बना रहे थे,

" पाकिस्तान के हुक्मरान दुनिया से भारत के खिलाफ समर्थन नहीं जुटा पाए अब हमें ही कुछ करना चाहिए नहीं तो इसे हमारी कमजोरी समझा जाएगा। गजवा-ए-हिन्द का जो मंसूबा हम बरसों से पाले हुए हैं उस पर भारत की इस कदम का बुरा असर पड़ेगा।"

"  सही कहते हो भारत को इस हरकत का माकूल जवाब तो देना ही चाहिए।"

"हैदराबाद में इंडियन मुजाहिदीन का एक मॉड्यूल है, उसे सक्रिय करें तो क्या ख्याल है?"

" क्या वे लोग आज के हालातों में हमला करने के काबिल हैं?"

 चारों बातें कर रहे थे तभी कमरे में बदरुद्दीन ने प्रवेश किया, सबको नमस्ते करने के बाद वह खाली पड़े सोफे पर बैठ गया। यूनाइटेड जिहाद कॉउन्सिल के अध्यक्ष मौलाना मंसूर अली ने अब तक जो चर्चा हुई उसके बारे में उसे बताते हुए कहा, " जनाब बदरुद्दीन भारत ने अपने संविधान से अनुच्छेद ३७० हटा दिया और न हम उस समय कुछ कर पाए और न ही आईएसआई ने कुछ किया। आज हमने आपको इसीलिए बुलाया है कि हम सभी मिलकर भारत को उसकी हिमाकत का माकूल जवाब देने का कोई प्लान तैयार कर सकें। "

बदरुद्दीन ने उससे पूछा, "आप सब तो यहाँ मेरे आने के पहले से ही बैठे हैं, कोई प्लान बनाया आप लोगों ने?"

  तो मौलाना जलालुद्दीन ने उसे बताया,   "हमने सोचा है कि भारत में हमारे जितने भी स्लीपर सेल्स हैं उन सभी को एक्टिव किया जाए और हर बड़े शहर में बम धमाके किए जाएँ, आपका क्या कहना है?"

बदरुद्दीन उसकी बात से सहमत नहीं था उसका मानना था, "मुझे लगता है कि इस बार हमें कुछ नया करना चाहिए जिससे नुकसान ज्यादा हो।"

"मतलब, क्या करना चाहते हैं आप?" 

" केमिकल अटैक, इससे हजारों लोग तो मरेंगे ही भारत सरकार की बदनामी भी खूब होगी। मुंबई इस अटैक के लिए सबसे सही जगह होगी और हम एक हमले के बाद रुकेंगे नहीं, कम से कम चार हमले और करेंगे। इन हमलों से भारत की सरकार कश्मीर में अनुच्छेद ३७० बहाल करने का दबाव बनेगा।"

       यूनाइटेड जिहाद कॉउन्सिल को आईएसआई प्रमुख बदरूद्दीन की योजना भा गई उन्होंने इसी को आगे बढ़ाने का निर्णय किया। क्या करना है यह तो तय हो गया पर कैसे करना है उसकी योजना दो दिन तक बनती रही। यह दो दिन भारत की सुरक्षा एजेंसियों पर भारी पड़ने वाले थे।

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            शौर्य को गायब हुए चार माह से अधिक हो गए हैं इस अवधि में आई.एस.आई. के गुप्तचरों ने उसकी खोज में हजारों फ़ोन कॉल्स टैप किए, अफगानिस्तान में उसके हर संभव सेफ हाउस पर छापे मारे, फिर भी उन्हें न तो शौर्य मिला न ही उसका कोई सुराग। आई.एस.आई. को समझ आ गया कि शौर्य के पीछे अपनी ऊर्जा और समय नष्ट करने से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। वैसे भी उसका गायब होना आई.एस.आई. के लिए अच्छा ही था क्योंकि 
ऊपर से "ऑपरेशन गाज़ी" शुरू करने के आदेश जफर के पास आ गए थे, इसको रोकने वाला अब कोई नहीं था। उसने अब इस पर काम करना भी शुरू कर दिया था।

   "सलाम बासित साब आपसे एक जरुरी बातचीत करनी है; कब आऊँ मिलने के लिए?", जफ़र ने कुंदूज प्रान्त के एक स्थानीय मिलिशिया नेता को फोन लगाया, शायद ऑपरेशन गाज़ी में इनकी भी कुछ भूमिका है। 

"कल शाम को पाँच बजे मेरे ठिकाने पर आ जाओ, हम वहीं बात करेंगे।"

     शाम के समय मिलिशिया के ठिकाने पर दोनों की मुलाकात हुई, कहवा पीते-पीते दोनों किसी विषय पर बातचीत करने लगे।


जफ़र - आपने मेरे प्रस्ताव पर गौर किया होगा।

बासित - जी बिल्कुल, आसिफ ने हमें सब कुछ बता दिया है और हम यह काम करना भी चाहते हैं, लेकिन हमारे लड़कों ने कभी इतने बड़े ऑपरेशन को अंजाम नहीं दिया इसीलिए वे थोड़ा घबराए हुए हैं।

जफ़र - फिक्र न करें, आईएसआई की ब्लैक ऑप्स यूनिट आपकी मदद के लिए रहेगी। यकीन मानिए इस ऑपरेशन के बाद आईएसआईएस अफगानिस्तान में पैर पसारने के पहले ही कमजोर पड़ जाएगा और आप तालिबान को भी हराने के काबिल बन जाएंगे। 

   जफर की बातों से मिलिशिया नेता बासित भविष्य की कल्पनाओं में खो गया। उसे बाहर निकाला जफर ने, " बासित साहब कहाँ खो गए? आपके लड़के हमारा साथ देंगे न?" 

" बिल्कुल जफर हम तुम्हारा साथ देंगे।" 

    " यह हुई न कुछ बात अब मुझे इजाजत दें ऑपरेशन के लिए बहुत सी तैयारियाँ करनी हैं।"

     जफर के जाने के बाद बासित मियाँ फिर से खयालों में खो गए जिसमें वह अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बने हुए थे।
वास्तविकता में भले ही ऐसा अभी होता नहीं दिख रहा है परंतु सोचने में क्या जाता है।

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     अफगानिस्तान के जलालाबाद नगर के किसी स्थान पर एक प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी एलीट सिक्योरिटी का हेडक्वॉर्टर था, यूएस की सरकार धीरे-धीरे अपने सैनिक अफगानिस्तान से हटा रही थी और उनके स्थान पर प्राइवेट एजेंसियों को अपने सहयोग के लिए भाड़े पर तैनात कर रही थी एलसेक भी उन्हीं में से एक एजेंसी थी, इस एजेंसी ने भारत सरकार के साथ भी कॉन्ट्रैक्ट किया था भारत द्वारा अफगानिस्तान में चलाए जा रही विभिन्न परियोजनाओं की रक्षा करने का जिम्मा भी उन्होंने ले लिया था। 

     एचक्यू के अंदर एक हॉल जैसे किसी बड़े कमरे में कुछ लोग बैठे थे और उनके सामने अफगानिस्तान के मानचित्र को टांग कर रखा गया था; इस पर दिख रहे तीन स्थानों को लाल घेरों के अंदर रखा गया था और उन पर टी-१ टी-२ और टी-३ लिखा गया था। एक व्यक्ति वहाँ उपस्थित लोगों को इन स्थानों के बारे में बता रहा था ऐसा लगता है कि यह लोग किसी सैन्य अभियान की तैयारी कर रहे थे।

        " ई.आई.ए. ने जो जानकारी हमें दी है उस आधार पर हमने इन तीन स्थानों को चिह्नित किया है जहाँ रासायनिक हथियार छुपाए जाने की संभावना है। इससे पहले की वे इनका उपयोग हमारे या हमारे सहयोगियों के विरुद्ध करें हमें वे हथियार अपने नियंत्रण में लेने हैं और हाँ आईएसआई भी इन हथियारों के पीछे पड़ी है इसीलिए आक्रमण आज रात ही २०० आवर्स(hours) को किया जाएगा, आप सभी यहाँ से जीरो हंड्रेड आवर्स पर बेस से निकलेंगे….
…… एजेंट विशाल आपकी टीम टी-१ पर हमला करेगी; आपका कॉल साइन होगा गैलीलियो, एजेंट योगेश आपका कॉल साइन कॉपरनिकस; आप टी-२ पर हमला करेंगे, एजेंट किशन आपका लक्ष्य टी-३ और कॉल साइन होगा केपलर, पूरा ऑपरेशन मैं यहीं से कोऑर्डिनेट करूँगा; मेरा कॉल साइन होगा जुपिटर। शेष जानकारी आपके सामने रखी फाइल्स में आपको मिल जाएगी। आज की ब्रीफिंग यहीं समाप्त होती है, जाइए ऑपरेशन की तैयारी कीजिए, डिसमिस।"
        
    अफगानिस्तान की घड़ियों में रात के १२ बजते ही तीन UH-60M ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर तीस सवारों को लेकर तीन दिशाओं में उड़ चले। हेलीकॉप्टर के रोटर ब्लेड्स के शोर से शत्रु सावधान न हो जाए इसीलिए उसके ठिकाने से दूर सभी एजेंट्स उतरे और पैदल ही चल दिए। 

   ठीक २०० आवर्स अर्थात रात के दो बजे हमला शुरू हुआ, टीम गैलीलियो के एजेंट्स ने तेजी से आगे बढ़कर गुफा के बाहर रखवाली कर रहे आतंकवादियों को मार दिया और अंधकार का लाभ उठाकर काफी अंदर तक घुस गए। आतंकवादी नींद में थे जिन पर रखवाली की जिम्मेदारी थी केवल वही जाग रहे थे, गैलीलियो ने उन सबको मार दिया पर इस बात का ध्यान रखा कि शोर न्यूनतम हो, फिर भी किसी को पता न चले ऐसा होना तो असंभव है, एक आतंकवादी ने मरते समय अपनी राइफल का ट्रिगर दबा दिया, पूरी गुफा में गोलियों की आवाज गूँज उठी जिससे अब तक सो रहे बाकी आतंकवादी जाग गए, उन्होंने अपनी राइफल्स उठा लीं और आक्रमणकारियों को भगाने का प्रयास करने लगे गुफा के अंदर लड़ाई छिड़ गई। बीस मिनट तक दोनों ओर से गोलीबारी होती रही जिसमें बचे-खुचे आतंकवादी भी मारे गए।

    कोपरनिकस को जहाँ हमला करना था वह एक पुराना सोवियत आर्मी बेस था, यहाँ एक छोटी सी हवाई पट्टी बनी थी जिसका उपयोग सोवियत-अफगान युद्ध के समय होता था। युद्ध समाप्त होने के बाद कुछ समय के लिए इस बेस पर मुजाहिदीनों का नियंत्रण था। 

  अब इराक और सीरिया से भागकर आए आतंकवादियों ने इसे अपना स्थाई ठिकाना बना लिया था। पहाड़ को खोद कर एक गुफा भी बना ली थी इन लोगों ने। अफगानिस्तान आए, आतंकवादी बने और गुफा में नहीं रहे तो क्या खाक अफगानिस्तान आए। 

       दूरबीन को आँखों से लगाए कोपरनिकस-१ पूरे क्षेत्र को स्कैन कर रहा था और हमले का प्लान बना रहा था, हवाई पट्टी के आसपास कुछ गाड़ियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं था, गुफा के द्वार पर भी रोक-टोक करने वाला कोई नहीं था यह देख कर उसके एजेंट दिमाग ने कहा कहीं यह कोई जाल तो नहीं। उसने अपने दो साथी एजेंट्स को निरीक्षण करने भेज दिया। दोनों छिपते छिपाते हवाई पट्टी और फिर गुफा के द्वार तक का निरीक्षण कर आए, यह कोई जाल नहीं था।

   गुफा के अंदर अंधकार के साथ-साथ सुई पटक सन्नाटा भी था, लगता नहीं था कि यहाँ कोई रहता भी होगा। फिर भी नाईट विज़न गियर पहने एजेंट्स पूरी सावधानी के साथ गुफा के निरीक्षण कर रहे थे। कोपरनिकस-१ के मन में प्रश्न उठा कहाँ गए सब?

   उसका उत्तर उसे अगले ही क्षण मिल गया जब उसने 
टेबल के पास एक शव पड़ा हुआ था उसके साथियों को भी कुछ शव मिले उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यहाँ हुआ क्या है। गुफा के अंदर रासायनिक हथियारों को खोजते हुए एक एजेंट को जनरेटर मिल गया उसने पाया कि डीज़ल नहीं था उसमें; पर वहीं पर कुछ कनस्तर पड़े थे डीज़ल से भरे हुए, उसने अपने साथियों को बताया इस बारे में,

" मुझे एक जनरेटर मिला है मैं उसे चालू कर रहा हूँ तुम सब अपने नाईट विज़न गियर निकाल लो"

"ठीक है।"

     जैसे ही गुफा में लगे बल्ब जले तो सब आश्चर्यचकित हो गए, पूरी गुफा में शव पड़े हुए थे ये आई.एस. के आतंकवादियों के शव थे। गुफा की दीवारों पर गोलियों के चिह्न थे, उनके टुकड़े और खाली शेल्स धरती पर बिखरे हुए थे। यह सारा दृश्य एक घमासान गन फाइट के बाद का लग रहा था।


      टीम केपलर अपने टारगेट पर पहुँच गई थी यहाँ एक प्राकृतिक गुफा थी जिसके बाहर तीन कच्चे मकान बने थे और चार-पाँच तम्बू लगे थे। पूरा क्षेत्र जंगल से घिरा हुआ था, जहाँ छिपने के लिए झाड़ियाँ और चट्टानों की बहुतायत थी। केपलर सामने से कैम्प की ओर बढ़ रहे थे क्योंकि यही एक मार्ग था, तभी एक आतंकवादी ने उन्हें देख लिया, वह अपने साथियों को सावधान कर पाता उसके पहले ही एक स्नाइपर ने तत्परता दिखाते हुए उसे हूरों के पास पहुँचा दिया पर दुर्भाग्य से उसका निर्जीव शरीर उस जगह गिरा जहाँ लैंड माईन थी। 



बड़ाssssम

     माइन का विस्फोट कैम्प में रह रहे आतंकवादियों को का ध्यान आकर्षित करने के लिए पर्याप्त था, अगले मिनट बाद ही लगभग अस्सी आतंकवादी वहाँ आ गए और एक गन फाइट शुरू हो गई, बीच-बीच में दोनों ओर से हैंड ग्रेनेड भी फेंके जा रहे थे। आतंकवादियों को बिना मारे गुफा के द्वार तक पहुँचना कठिन लग रहा था, तो केपलर-१ ने अपने हेलीकॉप्टर के पायलट से सहायता मांगी।

"स्विफ्ट-३ केपलर-१ बोल रहा हूँ कम इन ओवर"

" कम इन केपलर-१ हमने तय किया था न कि रेडियो बंद रहेगा ओवर?"

"हाँ पर हमें एयर सपोर्ट की आवश्यकता है इसके बिना मिशन पूरा नहीं हो पाएगा ओवर"

"ठीक है केपलर-१ दो मिनट में पहुँच रहा हूँ ओवर एंड आउट"

"जल्दी आना स्विफ्ट-१ केपलर-१ आउट।"

   एयर सपोर्ट के आने तक टीम ने किसी प्रकार स्वयं को शत्रुओं के घातक प्रहारों से बचाए रखा। दो मिनट बाद उनके ऊपर एयर टू ग्राउंड मिसाइल्स और हैवी मशीन गनों से सज्जित एक ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर उनके ऊपर मँडराने लगा उसके आने से टीम केपलर का जोश बढ़ गया उन्होंने अपनी गोलीबारी तेज कर दी।

"स्विफ्ट-३ शत्रु कैम्प की ओर से हम पर फायरिंग कर रहे हैं, हम लेजर से तुम्हें दिखाते हैं मारना कहाँ है", केपलर-१ ने ऐसा कहते हुए अपनी राइफल में निशाना साधने के लिए लगाए गए लेजर को ऑन करके कैम्प की ओर पॉइंट कर दिया उसके साथी एजेंट्स भी लेजर से पायलट को दिशा दिखाने लगे।

" रॉजर केपलर-१ शत्रुओं की पहचान कर ली गई है, मैं हमला कर रहा हूँ", पायलट ने निशाना मिल जाने के बाद मिसाइल छोड़ने का बटन दबाते हुए कहा।

शूंssss 

   हेलीकॉप्टर से एक मिसाइल छूटी; जो सीधा डीजल के कनस्तरों में जाकर लगी, विस्फोटक और डीजल के संगम से बहुत ही बड़ा विस्फोट हुआ जिसमें आतंकवादियों की रक्षा पंक्ति टूट गई पर यह उत्सव मनाने का समय नहीं था, गुफा के अंदर घुसना अभी बाकी था और लगता नहीं था कि ऐसा हो पाएगा क्योंकि आतंकवादियों ने अंदर से प्रतिरोध करना शुरू कर दिया था।

स्विफ्ट-३ ऐसे काम नहीं चलेगा बड़े हथियारों का प्रयोग करो ओवर। केपलर-१ 

सही कहते हो केपलर-१ तुम लोग पीछे हो जाओ, मिसाइल आ रही है स्विफ्ट-३ आउट।

  पायलट के मिसाइल दागने के पहले ही गुफा के अंदर से किसी ने हेलीकॉप्टर की ओर एक आरपीजी छोड़ दिया, हेलीकॉप्टर में लगे वार्निंग सिस्टम ने आते हुए खतरे को भाँप लिया और बीप बीप करने लगा। सही समय पर पायलट ने हेलीकॉप्टर की दिशा बदल दी और इंच भर की दूरी से आरपीजी का निशाना चूक गया, नहीं तो ४ अक्टूबर १९९३ को मोगादिशु में यूएस आर्मी रेंजर्स के हेलिकॉप्टर्स के साथ जो हुआ था वही इसके साथ होता, असाल्ट ऑपरेशन रेस्क्यू ऑपरेशन में बदल जाता। 

  हेलीकॉप्टर तो बच गया पर गुफा में छिपे आतंकवादी बचेंगे या नहीं कह नहीं सकते, क्योंकि पायलट ने आर्म्ड की हुई मिसाइल गुफा के अंदर भेज दी, उसके विस्फोट के बाद अंदर से हो रहा प्रतिरोध शांत हो गया। तो क्या सारे आतंकवादी मारे गए? यह तो जब टीम केपलर अंदर जाएगी तो पता चलेगा।


  ऑपेरशन शुरू हुए आधा घंटा बीत गया था, जलालाबाद के ऑपरेशन रूम में जुपिटर चिंतित लग रहा था, अब तक किसी भी टीम ने स्टेटस अपडेट नहीं किया था। तभी उसे चिंता मुक्त करने टीम गैलीलियो का संदेश आया,

गैलीलियो-१ टू जुपिटर कोई सुन रहा है ओवर?

गैलीलियो जुपिटर बोल रहा हूँ, ऑपेरशन का क्या स्टेटस है?

जुपिटर ऑपेरशन पूरा नहीं हुआ यहाँ रासायनिक हथियार नहीं हैं हमें यहाँ थोड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा पर टीम में किसी को चोट नहीं लगी है ओवर।

कोई घायल नहीं हुआ यह अच्छी बात है ।गैलीलियो बेस पर लौट आओ ओवर एंड आउट।

   टीम गैलीलियो से बात समाप्त कर जुपिटर ने टीम कॉपरनिकस से सम्पर्क किया,

जुपिटर टू कॉपरनिकस कम इन ओवर?

कम इन जुपिटर

कॉपरनिकस क्या तुम्हें रासायनिक हथियार मिले?

   नेगेटिव जुपिटर यहाँ सीडब्ल्यू नहीं मिले पर हाँ कुछ दस्तावेज मिले हैं जिनसे पता चलता है कि यहाँ हथियार रखे गए थे। हमें यहाँ लड़ाई के चिह्न मिले हैं तगड़ी गन फाइट हुई है, लगता है आईएसआई हमसे पहले आकर उन्हें ले गए, ओवर।
 
    यह बात सुनकर जुपिटर निराश हो गया, ठीक उसी समय केपलर का भी संदेश आया, 

"जुपिटर हमने पूरी गुफा में खोजा पर यहाँ रासायनिक हथियार नहीं हैं ओवर।"

"बेस पर लौट आओ केपलर ओवर एंड आउट।"


     एलसेक अपने ऑपेरशन में असफल हुई पर सभी एजेंट जीवित एचक्यू वापस लौटे और कोई भी गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ यह बात जुपिटर को खुश कर रही थी। ईआईए का काम अब और भी बढ़ गया था शीघ्रातिशीघ्र आईएसआई की योजना का पता लगाकर उसे विफल करना था उन्हें। शैडो जिसने आवश्यक इंटेल जुटाए थे उसने इसे अपनी निजी असफलता के रूप में लिया और आसिफ को खोजने निकल गया, एक वही बता सकता था कि जफर कहाँ है और आईएसआई क्या योजना बना रही है। पर वह अपने किसी भी सेफ हाउस में नहीं था, न ही उसने कोई सुराग छोड़ा था। शैडो को लगा उसके कंप्यूटर्स में कुछ मिल जाए पर आसिफ ने सभी कंप्यूटर्स से डेटा मिटा दिया था। ताकि कोई भी उसके पीछे न आ सके।

       शैडो पहले तो बड़ा निराश हुआ फिर उसे याद आया कि जासूसों के लिए एक विशेष सॉफ्टवेयर बनाया गया है जिससे हार्ड डिस्क से मिटाया गया डेटा रिकवर किया जा सकता है। इस सॉफ्टवेयर की सहायता से शैडो ने ८५ % डाटा रिकवर कर लिया; एक-एक फाइल खँगालने के बाद उसे काम का कुछ मिला तो बस एक नाम  "अनवर शेख"।

            आसिफ के कंप्यूटर में इसके साथ हुए वित्तीय लेन-देन की जानकारी दर्ज थी, उसने १ करोड़ डॉलर अर्थात १.६ अरब पाकिस्तानी रूपए हवाला के माध्यम से पाकिस्तान के अलग-अलग खातों में भिजवाए थे, दुर्भाग्य से इन खातों की पूरी जानकारी रिकवर नहीं हो सकी, आईएसआई के ऑपरेशन गाज़ी और इन लेनदेन का क्या संबंध है; कोई संबंध है भी या नहीं यह शैडो समझ नहीं पा रहा था, एक बार फिर से उसकी खोज अटक गई। अब तो आसिफ को खोजना बहुत ही आवश्यक हो गया था। उसी कंप्यूटर में ब्राउज़र हिस्ट्री रिकवर करने पर शैडो ने पाया कि आसिफ ने ऑनलाइन एयर टिकट बुक की है, पर वह गया कहाँ यह अभी भी अज्ञात है।

      वहीं दूसरी ओर फोरेंसिक एक्सपर्ट ने शायद वह कड़ी ढूँढ ली है जिससे ई.आई.ए. को आई.एस.आई. का पीछा करने में सहायता मिलेगी। आई.एस. के हाईड आउट से मिले शवों से उन्होंने जो गोलियाँ निकालीं वे माइल्ड स्टील कोर वाले ७.६२×३९ एमएम की आर्मर पियर्सिंग गोलियाँ थी; इनका निर्माण चीन की नोरिनको कंपनी करती है , नोरिनको ने ये गोलियाँ आई.एस.आई. को किसके माध्यम से बेचीं यह पता चले तो मामला कुछ आगे बढ़े और यह पता लगाने का जिम्मा निदेशक ने अपने सबसे योग्य साइबर विशेषज्ञ "एजेंट बाइनरी" को दे दिया।

     ईआईए के मुख्यालय में एजेंट बाइनरी अपने कंप्यूटर पर अपनी उँगलियों को व्यायाम करा था, मतलब वह नोरिनको के कंप्यूटर नेटवर्क में कमजोरी ढूँढ रहा था पर उसका काम सरल नहीं था कंपनी ने साइबर सुरक्षा के लिए काफी खर्चा किया था जिसका परिणाम भी दिख रहा था, एजेंट बाइनरी परेशान होने लगा था। चार-पाँच घंटे तक अलग-अलग तरीकों का प्रयोग करने के बाद अंततः उसे एक लूपहोल मिल ही गया इससे पहले की कंपनी के सुरक्षा इंजीनियर्स को पता चले बाइनरी उस कमजोरी का लाभ उठाकर उनके सिस्टम में घुस गया और दुनिया भर में बेची गई इन गोलियों के खरीददारों की सूची खोजने लगा।

यूरेका ....... बाइनरी ख़ुशी से उछल पड़ा, उसने गोलियों के खरीददारों को ढूँढ निकाला। उसने फोरेंसिक्स से मिली जानकारी से गोलियों के आकार-प्रकार से अपनी जानकारी को मिलाया तो उसे एक नाम मिला खालिद शेख। 

    खालिद शेख ने नोरिनको और पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम के मध्य हुए माइल्ड स्टील कोर गोलियों के सौदे में बिचौलिए की भूमिका निभाई थी और उन्हीं गोलियों का प्रयोग आईएसआई ने अफगानिस्तान में किया था, हो सकता है कि खालिद को पता हो कि यूनाइटेड जिहाद कॉउन्सिल और आईएसआई मिलकर क्या खिचड़ी पका रहे हैं। 

    जलालाबाद में स्टेशन इंचार्ज एजेंट जुपिटर ने अपने फील्ड एजेंट्स को तस्करों से सम्पर्क करने को कहा था, उसे लगता था कि यदि आईएसआई को बिना किसी बाधा के सीमा पार करना है तो उन्हें तस्करों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले मार्गों से जाना होगा। वह पाकिस्तान से लगने वाली सीमा का मानचित्र निकाल कर उसमें तस्करी के मार्गों को चिह्नित कर रहा था तभी उसके पास उसके एक खबरी का कॉल आया, 

     खबरी - अफगान-पाकिस्तान बॉर्डर पर तस्करों और अफगान बॉर्डर पुलिस के बीच मुठभेड़ हुई है ......... 

     " तो तुम यह बात मुझे क्यों बता रहे हो………यह कहते हुए जुपिटर ने उसकी बात बीच में ही काटने लगा।

   "  ........ अरे पूरी बात तो सुनिए , मुझे यहाँ स्टील कोर वाली गोलियाँ मिली हैं, आप ही बताइए कौन तस्कर ऐसी गोलियों का प्रयोग करता है। मुझे तो लगता है कि ये वही लोग हैं जिन्हें आप ढूँढ रहे हैं " ,खबरी ने अपनी बात पूरी की और इस बार जुपिटर ने उसे नहीं टोका।   
     

  "स्टील कोर गोलियाँ " यह सुनते ही जुपिटर की आँखों में चमक आ गई ,उसके चेहरे के भाव बदल गए - और क्या जानकारी है तुम्हारे पास ?

      आप यहाँ आ जाइए और खुद अपनी आँखों से देख लीजिए, खबरी की बातों में आत्मविश्वास झलक रहा था। 

         अब तक अफगान नेशनल पुलिस को भी इस मुठभेड़ के बारे में पता चल गया था घटनास्थल पर पहुँच कर उनके लोगों ने अपनी छानबीन शुरू कर दी थी। 
एक ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर वहाँ आया जिसमें से दो लोग उतरे एक तो एजेंट जुपिटर था पुलिस को इनके आने की जानकारी नहीं थी इसीलिए एक पुलिसकर्मी ने उन्हें रोक दिया और उनसे वापस जाने को कहने लगा जुपिटर ने उसे अपनी आईडी दिखाई तो भी वह नहीं माना क्योंकि उनके पास किसी भी प्रकार का सरकारी आदेश नहीं था, तभी सार्जेंट करीम वहाँ पर आया उसने अपने साथी पुलिसकर्मी से कहा, " ये जाँच में हमारा सहयोग करने आए हैं इन्हें आने दो।"

करीम की बात मानकर उस पुलिसवाले ने उन्हें जाने दिया। करीम कुछ बोलता इससे पहले जुपिटर ने ही उससे पूछा, "कहाँ हैं स्टील कोर गोलियाँ?"

"आइए मेरे साथ" करीम उन्हें अपने पीछे आने को कहा।

   जुपिटर ने घटनास्थल का अपनी आँखों से ही निरीक्षण करने लगा , गोलियों के खाली शेल्स यहाँ-वहाँ बिखरे हुए थे, पत्थर खून से लाल हो गए थे; कुछ गोलियाँ पत्थरों से टकराकर टुकड़ों में बिखर गई थीं, इन टुकड़ों में स्टील के टुकड़े साफ़ देखे जा सकते थे।

     एक दूसरा एजेंट बिजॉय वहाँ मौजूद टायरों के चिन्ह और शवों की फोटो ले रहा था काम खत्म होने के बाद वह जुपिटर के पास चला गया। एबीपी सार्जेंट करीम जीप के बोनट पर उस क्षेत्र का मानचित्र फैला रखा था वह और जुपिटर यह अनुमान लगा रहे थे कि यहाँ से आईएसआई वाले कहाँ-कहाँ जा सकते हैं। मानचित्र देखकर बिजॉय को कुछ ध्यान आया, 

" सर पेशावर में हमारे एजेंट्स हैं क्यों न हम उन्हें सक्रिय करें?"

" ठीक कहते हो बिजॉय मैं भी तुमको यही कहने वाला था, करीम और मेरा मानना है कि वे लोग खैबर-पख्तूनख्वा के शहरों में से होते हुए जाएँगे पेशावर के हमारे एजेंट्स इस पूरे क्षेत्र को कवर कर सकते हैं, उन्हें खबर कर दो।" 

जी सर, बिजॉय ने उसकी बात मानकर पेशावर संदेश भेज दिया। अब आगे का काम पेशावर के एजेंट्स को संभालना है।
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    पेशावर खैबर-पख्तूनख्वा प्रान्त की राजधानी,  यहाँ के लोगों को दूर संचार की सुविधा देने के लिए यूएई की एक कंपनी पीसीएम टेलिकम्युनिकेशन ने जगह-जगह अपने टावर लगाए हैं, अपने कामकाज को मैनेज करने के लिए इन्होंने नगर में अपना कार्यालय स्थापित किया है, जिसमें दाऊद गनी नामक एक कर्मचारी कार्यरत है, वह एक टेलिकम्युनिकेशन इंजीनियर है। उसे खबर मिली थी कि कंपनी का एक टावर ठीक से काम नहीं कर रहा है तो वह अपने मजदूरों को साथ लेकर टॉवर पर चढ़ कर उसकी मरम्मत कर रहा था तभी उसका स्मार्टफोन बजा। मरम्मत पूरी करके वह नीचे आया और अपना फ़ोन  देखने लगा, किसी ने उसे संदेश भेजा था। जब उसने संदेश की सूचना पर टच किया तो एक डायलॉग बॉक्स खुल गया जिसमें लिखा था पासवर्ड डालें। पासवर्ड डालकर उसने सन्देश को पढ़ना शुरू किया,

" मेहमान आपके घर की ओर आ रहे हैं उनके स्वागत की तैयारी कीजिए।"

   संदेश पढ़ते ही वह बिना देरी किए अपने कार्यालय चला आया। उसके आते ही रिसेप्शनिस्ट ने उसे बताया कि उसके वरिष्ठ अधिकारी कासिम ने उसे अपने केबिन में बुलाया था।

  " तुम्हें संदेश मिला?" उसके अधिकारी ने पूछा।

"हाँ मिला, पर मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम आईएसआई एजेंट्स को कैसे खोजेंगे?"

"हमें पेशावर और उसके आसपास से किए जाने वाले फ़ोन कॉल्स को इंटरसेप्ट करना है, कोई न कोई तो मुँह खोलेगा और हमें पता चल जाएगा, अब चलो।" कासिम की बात सुनकर भी दाऊद को संतोष नहीं हुआ।

    केबिन से निकलकर दोनों एक कमरे में आ गए जहाँ टेलीकॉम उपकरण, सर्वर्स और कुछ कंप्यूटर्स रखे हुए थे। कासिम ने एक कंप्यूटर पर कुछ बटन दबाए तो एक दीवार पर बना गुप्त द्वार नजर आने लगा। द्वार के उस पर था एक और कमरा जिसके बीच की दीवार पर एक बड़ी सी स्क्रीन लगी थी, यहाँ भी एक कोने में सर्वर्स रखे गए थे स्क्रीन के सामने पाँच कंप्यूटर रखे हुए थे। दाऊद और कासिम कमरे के दाएं भाग में रखी एक सर्वर जैसी दिखने वाली मशीन के पास जाकर उसे चालू करने लगे।

   " आतंकवादी आजकल अपनी बातचीत में बहुत ही अधिक सुरक्षा उपायों का प्रयोग करते हैं क्या ये नई मशीन उन सिग्नल्स को इंटरसेप्ट कर पाएगी? " दाऊद ने मशीन ऑन करते हुए पूछा।

"बिल्कुल इससे हम सुरक्षित बातचीत भी पकड़ सकते हैं और सिग्नल को उसके ओरिजिनेटिंग पॉइंट तक ट्रेस भी कर सकते हैं", कासिम ने बताया।

   मशीन अब पूरी तरह से ऑपरेशनल हो गई थी तो दोनों एजेंट्स कुर्सियों पर बैठ गए और अपने-अपने कीबोर्ड पर उँगलियाँ चलाने लगे, कभी-कभी वे मशीन में लगे नॉब्स को एक पॉइंट से दूसरे पॉइंट तक घुमाते भी थे। उनकी मेहनत रंग लाई उन्होंने एक ऐसे सिग्नल को इंटरसेप्ट किया था जिस पर कई परतों की सुरक्षा लगाई गई थी। उन दोनों ने सुरक्षा हटाई तब उन्हें कुछ सुनने को मिला

    " जफर साहब हमारी ओर से ऑपरेशन गाज़ी की पूरी तैयारी कर ली गई है, खालिद ने हम तक डेटोनेटर्स पहुँचा दिए हैं, हमारे लड़के जाने के लिए तैयार हैं पर आपके कारण ऑपरेशन शुरू नहीं हुआ है। आपके लोग अभी तक डर्टी बॉम्ब लेकर हमारे पास आए नहीं हैं। क्या आपके लोग जानते नहीं ये ऑपरेशन कितना मायने रखता है हमारे लिए?"

   यह आवाज दाऊद को कुछ परिचित सी लगी, उसने कासिम की ओर देखते हुए कहा, यह आवाज तो.....

"नूर मोहम्मद की है", कासिम ने उसकी बात पूरी करते हुए कहा, " जल्दी सिग्नल ट्रेस करो हमें ऐसा अवसर दोबारा मिलेगा, वर्षों के बाद यह आवाज सुनने को मिली है।

"तुम्हारे बोलने से पहले ही मैंने ट्रेस करना शुरू कर दिया है", दाऊद ने कंप्यूटर के कीबोर्ड पर से सिग्नल ट्रेस करने वाले कमांड डालते हुए कहा। कमांड एक्सीक्यूट हुआ और स्क्रीन पर दिख रहा मानचित्र हिलने लगा।

नूर मोहम्मद की बात का जफर ने उठते देते हुए कहा, " मैं जानता हूँ नूर साहब और मैं भी उनसे संपर्क करने की कोशिश कर रहा हूँ पर नेटवर्क नहीं मिलने के कारण बात नहीं हो पा रही है। जैसे ही उनसे बात होती है मैं उन्हें आपके पास जल्दी पहुँचने को कहूँगा।"

    ठीक है जफर साहब, पर देरी के लिए उन्हें हम माफ नहीं करेंगे। इतना कहकर उसने फोन रख दिया।

  फोन कट गया दाऊद के चेहरे पर उदासी थी। कासिम ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया," हमारा भाग्य हमारे साथ नहीं है कुछ सेकंड और बातचीत चलती तो हमारे पास नूर मोहम्मद की सटीक लोकेशन होती पर अभी इतना ही पता चल पाया है कि कॉल खैबर पख्तूनख्वा के शांगला में काराकोरम हाईवे के पास कहीं से की गई है।"

" तो फिर मैं नौशाद को बोलता हूँ एक सर्विलांस ड्रोन शांगला रवाना करने को", कासिम ने कहा।

   दस मिनट बाद सेफ हाउस की छत से एक सर्विलांस ड्रोन आतंकवादियों के कैम्प का पता लगाने शांगला की ओर उड़ चला। अब तक उन्हें जो भी जानकारी मिली थी कासिम ने वह सब कुछ एजेंसी के निदेशक को बताने के लिए सिक्योर लाइन से फ़ोन किया।
 
कासिम - सर हमने अभी-अभी एक फ़ोन कॉल इंटरसेप्ट किया है; जिसमें हमें नूर मोहम्मद और आईएसआई एजेंट जफर के बीच बातचीत हो रही थी। उनकी बातचीत से हमें मालूम हुआ कि खालिद ने जैश को रासायनिक हथियारों के डेटोनेटर्स बेचे हैं और आईएस से चुराए हथियार वहीं पहुँचाए जा रहे हैं।

निदेशक - उनकी लोकेशन क्या है?

 कासिम -  नहीं सर हम लोकेशन ट्रेस नहीं कर पाए, पर हमने एक सर्विलांस ड्रोन काराकोरम हाईवे की निगरानी के लिए भेज दिया है, नूर मोहम्मद उसी क्षेत्र में कहीं है।

निदेशक - जैसे ही ड्रोन का फीड तुम्हें मिलना शुरू हो उसे मुख्यालय में रिले कर देना।

कासिम - समझ गया सर।  

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  नौशाद का छोड़ा हुआ ड्रोन काराकोरम हाईवे के पास के पहाड़ों के ऊपर उड़ते हुए जा रहा था तभी उससे मिल रहे चित्रों में नौशाद को कुछ देखा, "कासिम यहाँ देखो पहाड़ों पर एक बड़ा सा परिसर है, शायद यह कोई मिलिट्री कैम्प है। यहाँ बहुत से बंदूकधारी लोग दिख रहे है।"

कासिम ने ध्यान से देखा तो उसे कुछ और ही पता चला, "नहीं नहीं यह मिलिट्री नहीं आतंकवादियों का कैम्प है, पर इसकी जानकारी तो हमारे डेटाबेस में नहीं है, ज़ूम करो इस पर पता तो चले कौन-कौन है यहाँ।"


  परिसर पर ज़ूम करने से उन्हें कुछ लोग दिखाई दिए जो जमीन पर बैठे हुए थे उनके सामने एक व्यक्ति माइक पर कुछ बोल रहा था। दाऊद ने उसका चेहरा लेकर फेसिअल रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर के माध्यम से एजेंसी के डेटाबेस में मौजूद चेहरों मिलाना शुरू कर दिया। सॉफ्टवेयर ने उस व्यक्ति को पहचान लिया, वह था नूर मोहम्मद, जैश-ए-मोहम्मद का एक टॉप कमांडर जिसके ऊपर भारत में किए जाने वाले आतंकवादी हमलों की जिम्मेदारी थी।

  कासिम ने तुरंत मुख्यालय में एजेंसी के निदेशक को फ़ोन लगाया और उन्हें बताया कि उन लोगों ने आतंकवादियों का ठिकाना खोज निकाला है। 

"अब आगे के क्या आदेश हैं सर?" कासिम ने उससे पूछा।

निदेशक ने उसका उत्तर कुछ इस प्रकार दिया, "तुम लोग कैम्प पर दृष्टि बनाए रखो और पल-पल की जानकारी देते रहना। अब हमें आतंकवादियों को रोकने के लिए सरकारी सहायता की भी आवश्यकता पड़ेगी।"




कहानी जारी है, मिलते हैं अगले भाग में.…..