पपीहे की गुंजन है या सावन की आहट 
भीगे से सावन में तेरी साँसों की गर्माहट,
महक उठती हूँ इस ख्याल से भी 
मेरे यूँ महकने की वजह तुम हो!

एहसास,जो तुम्हें छू कर 
गुज़रे मेरे दिल से
लब पर मुस्कान सजाता है,
तुम मानो न मानो, मैं कैसे न मानूं
मेरे यूँ मुस्कुराने की वजह तुम हो!

खामोश रही ज़ुबाँ मेरी,
आँखें तो सब ब्याँ करती हैं 
क्या करूँ अगर,
खामोशी तुम समझते नहीं..
और नज़र भी तुम्हारी,
तो है बेपरवाह सी,
तुम कहाँ जानते हो कि 
पलकों के पर्दे में छिपे 
हर जज़्बात के मचलने की 
वजह तुम हो!

नेह बादल पिघलते हैं और 
यह जो बरसती हैं वक्त-बेवक्त..
नैनों के अंबर से उतर, 
मन का आंगन भिगोने वाली 
इस बरसात की वजह- 
बस! तुम ही तो हो! 

स्वरचित-- शालिनी अग्रवाल 
 जलंधर