जो नही है मेरा अपना
वो ही अपना सा क्यूँ लगे !
रहूं दिन भर यूं खोया सा
जो खोया हो कुछ अपना
ये भी तो समझ ना आए
जो कभी पाया ना था
खोया है वो ऐसा क्यूँ लगे !
क्यूं सुबह सुहानी नही लगती
क्यूं ये शाम उदास लगे
रातों कि क्यूं नींद उड़ी है
हकीकत में है जो बेगाना
ख़्वाबों में वो अपना क्यूं लगे !
हम चाहें बस उसको ही
वो शायद कुछ हमको भी
उसके अपने और भी तो हैं 
नही है हक जिसपर अपना 
उस पर यूं जताने क्यूँ लगे!
जो नही है मेरा अपना
वो ही अपना सा क्यूँ लगे !!
सतीश निर्दोष
रेवाड़ी (हरियाणा )