हे- स्त्री
आभूषण समझ
तुम जिनसे
श्रृंगार करती रही
बन-ठन कर
सुंदरता पर अपनी
चार-चाँद लगाती रही।
तन पर छेद करके
स्वयं को आईने में
निहारती रही
वो तुम्हारे आभूषण
सौंदर्य वर्धक थे तुम्हारे
वैदिक काल से
जिन्हें सजाती रही
बड़े लगाव से
टटोलती रही स्वयं को
गहनों में
और दूर होती रही
कागज कलम से
तो जिनसे तुम्हें
लगाव है
प्यार है बेशुमार
अलंकार नही वो
जंजीरें है तुम्हारी
छीनते है जो आजादी तुम्हारी
और तुम इस
बनावटी श्रृंगार में
लपेट खुद को
खोती रही।
बना ली एक रेखा
घर के अन्दर
सिमटती रही।
आजाद हो तुम
तो क्यों आजाद नही होती
कभी गहनें
कभी परम्पराए
कभी रीति रिवाज
कभी मान मर्यादा
कभी स्त्री होने के दंश
में क्यों बँधती रही
स्वयं को स्वयं
क्यों आजाद नही करती
और दोषारोपण
पुरषों पर करती
हे-स्त्री।
अप्रकाशित मौलिक रचना
गरिमा राकेश गौत्तम
खेड़ली चेचट कोटा राजस्थान