प्रेम में नकाब नहीं होती
वो तो बेहिसाब होती है
लफ्ज़ ठहर भी गए
फिर भी हृदय से संवाद
होती है चूंकि प्रेम तो
बेहिसाब होती हैं
प्रत्यक्ष ना सही
अप्रत्यक्ष भी दीदार होती है
शांत रहता है लफ्ज
पर हृदय में शैलाब रहती है
अपूर्ण ही सही,
पर प्रेम बेहिसाब रहती है
शिकायत की कोई
गुंजाइश नहीं
इंतजार भी बेहिसाब होती है
प्रेम में नकाब नहीं
बस हृदय बेहिसाब होती है
प्रिया ❤️✍️

0 टिप्पणियाँ