सजी नवेली
संग सखी सहेली
मुखुर हंसी ।
मंडप छाए
मंगल गीत गाएं
पाएं आशीष।
कन्या दान
पितृ कर महान
बना संबंध।
छोड़ बाबुल
चली पिया मिलन
देहरी छूटी।
संग सपन
भर उर उमंग
चली थिरक ।
जान अपना
संग चली विदेश
सुन आदेश ।
नयन नीर
सुता मन अधीर
माता विकल।
साथी समझ
समाई पिया मन
सात जनम।
सुख की चाह
आई पिया सदन
भर सुहाग।
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर मध्यप्रदेश

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