क्या जीवों का संबंध इसी संंसार में होता है। अथवा कुछ से पूर्व जन्म से ही कुछ रिश्ता होता है। कुछ अपने आप मन को इस तरह भा जाते हैं कि जैसा उनसे जन्म जन्म का संबंध हो। प्रेम के तार केवल एक जन्म के तो नहीं हो सकते।

   आज तक मन में बसे युवक से लक्ष्मी की कोई बात नहीं हुई थी। संकल्प भी इससे पूर्व कभी लक्ष्मी से नहीं बोला था। पर जब लक्ष्मी ने विशाल के साथ जीवन जीने का निश्चय कर लिया, तभी एक बार फिर से उसके सामने संकल्प आ गया। लक्ष्मी को लगता कि मानों संकल्प उसे धिक्कार रहा है। उससे बोल रहा है "लक्ष्मी। यह क्या? ध्यान से देखो। हमारा प्रेम तो अनेकों जन्मों का है। हम अनेकों जन्मों से एक दूसरे के जीवन साथी रहे हैं। पर इस जन्म में इस तरह मुझे छोड़ किसी अन्य के साथ जीवन का पथ किस तरह तय कर सकती हो।"

  फिर लक्ष्मी खुद व खुद सोचने लगती। क्या यह सत्य तो नहीं। जब मेने अपने पथ पर आगे बढने का निश्चय कर लिया, तभी संकल्प मेरे जीवन में फिर से क्यों आया है। क्या शायद इसीलिये कि हमारा कुछ तो संबंध है। कहीं मैं विशाल को धोखा तो नहीं दे रही। क्या मुझे विशाल को तथा अन्य सभी को सच बता देना चाहिये। वैसे भी मैं तो विशाल को सब सच बताना चाहती थी। वही तो मेरा वास्तविक मित्र है। मेरी हर समस्या का निदान वह निकालता रहा है।

  पर तभी मन में एक दूसरी आवाज उठती।

  " लक्ष्मी। इस समय यह क्या सोच रही है। अब यह तेरे जीवन का प्रश्न नहीं है। तेरे माता पिता के सम्मान का प्रश्न है। भला तेरी इच्छा तेरे माता पिता के सम्मान से बढकर कैसे हो सकती है। फिर लगता तो नहीं कि संकल्प के मन में भी तेरे लिये ऐसी ही भावना हो। उसके चेहरे पर तो कोई दुख नहीं है। उस दिन गोदभराई के समय भी वह कितना खुश दिख रहा था। ठीक है कि तू भी अपने आप को खुश ही दिखाती हूं। पर तेरी बात अलग है। तू स्त्री है । अपने मन को मारना तुझे आता है। पर क्या कोई पुरुष किसी स्त्री की तरह मन को मार सकता है। शायद नहीं। "

  दूसरी तरफ संकल्प के हालात भी कुछ अलग नहीं थे। दिन भर तो सभी के सामने मुस्कराता रहता। पर रात में जब संसार निद्रा देवी के माध्यम में स्वप्न लोक में विचरता, तभी संकल्प दुनिया से छिपाकर अपने आंसू बहा लेता। हालांकि उसे जरा भी अहसास नहीं था कि वही लक्ष्मी के मन में बसा हुआ है। ऐसी बातों की कल्पना भी कौन कर सकता है कि एक प्रतिष्ठित वकील की इकलौती पुत्री मन ही मन किसी ड्राइवर के पुत्र से प्रेम करती है। संसार में तो लोग प्रायः धन, सुंदरता और औहदे से प्रेम करते हैं। पर सच्चा प्रेम हमेशा गुणों से होता है। सच्चा प्रेम अमीरी और गरीबी के बंधनों से पूर्ण मुक्त होता है। यह दूसरी बात है कि सच्चा प्रेम होता बहुत कम है। पर ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सच्चे प्रेम का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जिस दिन धरा से सच्चा प्रेम पूर्णतः नष्ट हो जायेगा, उसी दिन भक्ति भी नष्ट हो जायेगी। क्योंकि भक्ति और कुछ नहीं अपितु प्रेम ही तो है। जिस दिन भक्ति नष्ट हो जायेगी, उसी दिन संसार से माधुर्य नष्ट हो जायेगा। और जब माधुर्य ही नहीं रहेगा तो फिर मनुष्य मनुष्य ही नहीं रहेगा। मशीन बन जायेगा। जिसके भीतर कोई भावनाएं ही नहीं।

   विशाल और लक्ष्मी का रिश्ता तय होने के बाद संकल्प का लक्ष्मी के घर आना जाना बढ गया था। वास्तव में डाक्टर नामदेव व सुनीता जी को संकल्प पर ज्यादा ही भरोसा था। संकल्प जिम्मेदार भी था। इसलिये चाहे कुछ भेंट भेजनी हो, या कोई अन्य बात, हमेशा संकल्प को ही याद किया जाता। ऐसे में बार बार संकल्प और लक्ष्मी का एक दूसरे से मुंह मोड़ना संभव न था। स्वभाव के प्रतिकूल कुछ भी करने पर दूसरों को संदेह का मौका मिलता है। घर आये हर अतिथि का स्वागत लक्ष्मी ही करती आयी थी। वैसे भी वह शहर में पली बढी थी। आज तक घर आये हर युवक से वह कुशलक्षेम पूछती आयी थी। फिर यदि वह संकल्प के लिये ही संकोची बन जायेगी तो संभव है कि मम्मी या पापा कुछ समझ जायें। लक्ष्मी किसी को ऐसा मौका देना नहीं चाहती थी। 

   संकल्प केवल काम से काम रखना चाहता था। पर यदि वह लक्ष्मी की बातों का प्रतिउत्तर न दे तो यह भी अशिष्टाचार ही माना जायेगा। अभी तक दोनों के मध्य कोई बात नहीं हुई थीं। पर लक्ष्मी और विशाल का संबंध तय हो जाने के बाद ही दोनों एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझने लगे। 

  कई बार लगता है कि ईश्वर जिन्हें मिलाना चाहता है, उन्हें किसी न किसी बहाने नजदीक ला देता है। पर यहाँ तो कहानी ही उल्टी दिख रही है। जैसे जैसे लक्ष्मी और विशाल का मिलन नजदीक आ रहा था, वैसे वैसे लक्ष्मी और संकल्प की नजदीकी बढती जा रही थी। दोनों के दिलों की आह बढती जा रही थी। कह नहीं सकते कि नजदीकी की परिणति मिलन में होगी या नहीं। दोनों ही स्थितियों में एक एक बात तो निश्चित ही है। यदि इस नजदीकी के बाद भी लक्ष्मी और संकल्प का मिलन नहीं हुआ तो दोनों का जीवन एकदम नीरस हो जायेगा। और यदि दोनों का मिलन हुआ तो इसका अर्थ यह होगा कि लक्ष्मी और विशाल का रिश्ता तय होना वास्तव में लक्ष्मी और सकल्प को नजदीक लाने का एक हेतु है। जो मिलन अभी तक सपनों में ही होता रहा है, क्या वह यथार्थ में संभव है। 

   लक्ष्मी अपने माता पिता की खुशियों और उनकी इज्जत से बहुत प्रेम करती है। संकल्प भी अपने मित्र की खुशियों के लिये अपनी खुशियों को दाव पर लगा सकता है। दोनों अपने दिल की बात किसी अन्य से तो दूर, एक दूसरे से भी नहीं कहेंगे। सारे समीकरण तो यही इशारा कर रहे हैं कि दोनों की नजदीकी के बाद भी शायद यह मिलन संभव नहीं है। पर असली समीकरण तो वास्तव में ईश्वर ही बनाते हैं। कहते हैं कि उनकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है। फिर लक्ष्मी और संकल्प की नजदीकी का जिस तरह समीकरण बना है, उसे देखते हुए यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि अभी कूछ अन्य समीकरण और सामने आने हैं। शायद जिन्हें देखकर एक बार को तो किसी को यकीन न हो। ऊंट किसी भी करवट लेट सकता है। तथा कहानी मे भी कोई ऐसा ट्विस्ट आ सकता है जो कहानी को एक सार्थक अंत दे सके। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'