विभा आज विजय सक्सेना के फोटोग्राफी प्रदर्शनी में एक पत्रकार की हैसियत से आमंत्रित थी... क्या ग़ज़ब ग़ज़ब के पिक्चर्स क्लिक किए थे विजय सक्सेना ने.. Very impressive... सोचते हुए एक तस्वीर के सामने ठिठक गई..लिखा था "खुशियों की बचत".. जो झुग्गी के एक परिवार पति पत्नी और तीन बच्चों की खिलखिलाती तस्वीर थी... छोटा बच्चा जो तीन साल का लग रहा था.. वो भी खिलखिला रहा था... और तस्वीर जिस तरीके से ली गई थी.. मनभावन.. मनमोहक बन उठी थी... प्रदर्शनी में आए सारे अतिथि के लिए ये तस्वीर चर्चा की विषय बनी हुई थी...
कोई कह रहा था "सच में यार खुशियों के लिए पैसों की जरूरत नहीं होती है... देखो मुफ़लिसी में भी इनके चेहरे पर कितनी खुशी और चमक है... हम पैसों की बचत करते हैं.. ये खुशियों की बचत करते हैं.. बिल्कुल सही कैप्शन दिया है सक्सेना साहब ने...
सबने उन महोदय का समर्थन किया... विभा भी उस समय मन ही मन समर्थन करती आगे बढ़ गई...
एक एक कर सारी तस्वीरें बिक गई... और खुशियों की बचत तो सबसे महँगी रही... तीस लाख... सक्सेना जी को पैसों की बचत के लिए ढ़ेर सारे पैसे दे गई...
डिनर भी रखा गया था सबके लिए ..डिनर के साथ साथ अब मेरे काम का समय भी शुरू हुआ था... प्रदर्शनी में आए अतिथियों से बातचीत करना.. विजय सक्सेना का इंटरव्यू और सब मिला कर इस प्रदर्शनी की सफ़लता पर समाचार तैयार करना...
घर आकर समाचार तैयार कर विभा ने अपने ऑफिस मेल कर दिया.... धीरे धीरे समाचार ढूँढते... लिखते...बोलते दिन गुजरने लगा... 
एक दिन ख़बर आई कि किसी झुग्गी में ज़हरीली शराब पीने से कुछ लोगों की मृत्यु हो गई है... उसके कवरेज के लिए विभा को भेजा गया... विभा दुःखी होकर झुंझला रही थी... अपने फायदे के लिए लोग क्या क्या करते हैं.. अगर दुनिया में कुछ सबसे सस्ता है तो लोगों की जान... ये जानते हुए भी ये अमृत नहीं है.. इसके पीछे सब जान देने पर उतारू रहते हैं... विभा के साथ आए
फोटोग्राफर ने उसे शांत करते हुए कहा - पहुँच गए हैं हम लोग.. चलो देखते हैं....
वहाँ का माहौल इतना ज्यादा खराब था कि विभा की हिम्मत नहीं हो रही थी.. किसी से बात करने की... फिर भी काम तो काम था.... समाचार तो तैयार करना ही था.. सो उसने वहाँ मौजूद तमाशबीन लोगों से ही बात करने का मन बनाया... अभी विभा सबसे बातें कर रही थी कि चीखने चिल्लाने की आवाज़ आने लगी... लगा जैसे कोई हाथापाई कर रहा है.. ऐसे समय में भी.. सोचते हुए विभा के कदम उधर ही बढ़ गए...
देखती है इस समय भी एक आदमी शराब पिए हुए एक औरत के साथ मारपीट कर रहा था... उसके बच्चे सहमे से एक ओर खड़े थे.. वो औरत गाली देते हुए कभी खुद को.. कभी बच्चों को बचाने की कोशिश कर रही थी..
विभा जाकर उस औरत को बचाती है... साथ ही उस आदमी को शराब पीने और मारपीट करने के आरोप में पुलिस में दे देगी.. ये कहकर धमकाती है.... वो आदमी लड़खड़ाते हुए.. बड़बड़ाते हुए वहाँ से चला जाता है.. पूछने पर औरत बताती है... मेरा ही मर्द है दीदी... रोज की बात है.. शराब पीना.. मना करने पर मारपीट करना आदत है उसकी..... विभा को बार बार लग रहा था कि इस औरत को कहीं देखा है.. पर कहाँ... वहाँ से निकलने लगी कि अचानक उसके दिमाग में बिजली चमकी.. विजय सक्सेना की "खुशियों की बचत"...
विभा - तुमलोग वही हो ना.. जिसकी तस्वीर विजय सक्सेना ने अपने कैमरे से उतारी थी..
औरत - नाम तो पता नहीं दीदी.. एक महीने पहले एक साहब ने जरूर हम सबों की फोटो ली थी..
विभा - पर उस तस्वीर को देखकर लग रहा था कि कम साधन में भी तुम लोग खुशियों को संजोते हो..यहाँ तो सब कुछ उल्टा ही दिख रहा है...
औरत - कौन सी ख़ुशियाँ दीदी... दिन भर बच्चों के साथ कचरा बीन कर आओ... रात ये सोचते गुजार दो कि कल बच्चों को भरपेट खाना मिलेगा भी या नहीं.. बाप को शराब के अलावा किसी चीज़ से मतलब ही नहीं है... भूखे पेट हँसना क्या रोना भी नहीं आता दीदी... खुशी क्या आएगी.. उन साहब ने उस तस्वीर के लिए दस हज़ार भी दिए थे.. 
विभा - सिर्फ दस हज़ार...
औरत - हमें तो आज तक समझ नहीं आया कि हम सब की फोटो क्यूँ खिंची थी उन्होंने...और उसके बदले इतने पैसे क्यूँ दिए...
विभा से कुछ कहते नहीं बना... दिमाग में सक्सेना साहब की कही बात चल रही थी... गरीबी में भी खुशी ढूँढना पसंद है मुझे... मेरी प्रेरणा हैं ये लोग...
विभा के चेहरे पर नफरत से भरी हँसी तिर जाती है.. यही है सक्सेना की "खुशियों की बचत"... अपने प्रेरणा स्रोत को देखने दुबारा कभी नहीं आ सके . बातें इतनी बड़ी.. और काम इतने छोटे....
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली 
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