दुश्यंत के लापता होने के बाद से सुनंदा अक्सर दुश्यंत के घर ही रहने लगी । जैसे वह इस घर की बहू हो । उसका पति शहीद हो गया है। बिना भांवर के सुनंदा एक विधवा का जीवन जी रही थी। उसे देख धैर्यवानों का धैर्य भी जबाब दे देता। ईश्वर के न्याय में दोष निकाले जाते।

   आज के समय में  पति की अर्थी उठते ही वधू दूसरा वर तलाश करने लगती है। इसमें कोई गलत बात भी नहीं है। जिस कन्या का पूरा जीवन पड़ा है, उसका जीवन फिर से संवर जाता है। वहीं सुनंदा कुछ अलग करके दिखा रही थी। वहाव के विपरीत तैर रही थी। जिसकी शक्ति वास्तव में उसे प्रेम साधना से मिल रही थी।

   आखिर वह दिन आ गया जब उसकी अनेकों महीनों की साधना का फल मिलने बाला था। वैधव्य के श्वेत  वस्त्रों में रंग भरने बाला था। आर्मी से पत्र आया कि एक युवक मिला है। जो बहुत हद तक कैप्टन दुश्यंत जैसा है। उसके सारे चिन्ह कैप्टन दुश्यंत जैसे हैं। आर्मी रिकार्ड में  कैप्टन दुश्यंत का ब्लड ग्रुप बी पोजिटिव है। और इस युवक का ब्लड ग्रुप भी बी पोजिटिव है। पर युवक की ज्यादातर याददाश्त जा चुकी है। उसे बस अपने जानकारों में सुनंदा का नाम ध्यान है। आर्मी की तरफ से विशाल व राधा की के साथ सुनंदा को भी लाने का अनुरोध किया। ताकि डीएनए टैस्ट से उसकी सही पहचान की जा सके। वह सुनंदा को पहचान सकता है। इससे भी उसकी पहचान में मदद मिलेगी।

  जैसे कोई फसल बर्बाद होने जा रही हो, उसी समय इंद्र देव की कृपा हो जाये। सूखती फसल फिर से लहराने लगे। ईश्वर के घर अनेकों बार देर होती है। पर साधना का फल जरूर मिलता है। दुश्यंत सब भूल गया। फिर भी उसका प्रेम उसे याद रहा तो इसका कारण बस सूनंदा की प्रेम साधना ही कहा जा सकता है। 

   दुश्यंत ने सुनंदा के अलावा किसी को नहीं पहचाना। डीएनए टैस्ट से उसके दुश्यंत होने की पुष्टि हो गयी। दुश्यंत घर आ गया। वैसे अब वह आर्मी के लिये योग्य नहीं रहा। फिर भी वह अपनी क्षमता के हिसाब से कहीं भी नौकरी कर सकता है। पर वास्तविक समस्या उससे भी अधिक कठिन थी। अभी तो दुश्यंत को सारी याददाश्त याद दिलानी थी। तभी तो वह अपना सामान्य जीवन जी सकता है। सभी के साथ साथ सुनंदा की परीक्षा की घड़ी थी। पर प्रेम पथ के साधक किसी भी परीक्षा से नहीं घबराते। 

   सुनंदा की साधना चलती रही। दिन या महीने की बात नहीं बल्कि सालों लग गये। एक पढी लिखी युवती ने अपना कैरियर भी दाव पर लगा दिया। इतनी सामर्थ्य केवल एक स्त्री में ही होती है। सुनंदा जरूरत के समय दुश्यंत की शिक्षिका बन जाती तो कभी उसकी दोस्त। कभी कभी माॅ की तरह अधिकार भी दिखाती। कई साल बीत गये। अब दुश्यंत पहले की तरह स्वस्थ हो गया। अपनी योग्यता से वह एक बैंक में नौकरी करने लगा। 

  दुश्यंत और सुनंदा का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ। कहानी आंसुओं की अब पूर्ण हुई। सुनंदा ने भी फिर से अपने कैरियर पर ध्यान दिया। वह भी एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय में लैक्चर नियुक्त हो गयी। दोनों का जीवन खुशियों से भरा था। 

   पर जैसा कि विदित है कि कहानी आंसुओं की एक बार शुरू होकर कभी समाप्त नहीं होती। आंसुओं की एक कहानी पहाड़ी इलाके में जन्म ले चुकी थी। जिसे पूरा लिखे बिना यह उपन्यास खत्म नहीं हो सकता है। इतने समय में मामो की जिंदगी में बड़ा भूचाल आ चुका है। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'