आज जय के आने की बात पर सुरभि, खुश न थी, आँखों मे वो इंतजार न था।
जबकि जय 10 दिन की ट्रेंनिग के बाद लौट रहा था।
इस बीच फोन तो रोज किया उसने पर रूटीन ही पूछा और कुछ नहीं।
क्योंकि जब जय का फोन आया तो उसके शब्द कुछ यों थे--  "सुरभि मैं आज शाम तक आ जाऊँगा,  खाने में क्या बना रही, यह नही वो बना लेना, और बात करता आकर,,
ख्याल तो वह वैसे भी रखती उसकी पसन्द का ।
काश यह न कहकर यह कहा होता जय ने मन मे एक।
  तेरा वो मेरा ख्याल रखना,
कैसी हो तुम फिक्र से पूछना,
मैं आ रहा हूं सुनों,
बिंदी थोड़ी बड़ी लगाना,
होठों की लाली गहरी रचाना,
चूड़ी थोड़ी ज्यादा डालना,
बालों को थोड़ा ढीला बंधना,
यही सब सोंच रही थी  जय के जाने के बाद सुरभि, काश आने से पहले यही सब बोला होता जय नें तो वह कितना चहक जाती, बस यही दो शब्द तो चाहती हर औरत, अफसोस सबको इतना खुशनसीब मुकद्दर नही मिलता।, अब जो भी है किसी से कह भी नही सकती ।
किसी का छोड़ों खुद जय से कहने की हिम्मत भी नही कर पाती , एकबार कहा था जय आप कैसे हो,,
न कभी मुझसे यह कहते बड़ी बिंदी लगाओ, न कहते होठों को डार्क टच दो, न कहते बालों को खुला रहने दो न कहते ज्यादा चूड़ी पहनों , तुम तो गौर भी नही करते मेरी माथे की सिकन, या मेरे होठों की मुस्कुराहट का, कभी नही कहते इतनी खुश या इतनी उदास क्यों हो।
कभी न तो तुम्हें आँखों मे लगा काजल दिखता न कभी उनमें बहते आसूं,  न कभी हौले से प्यार जताते, न कभी तेजी से परवाह ।
जय का वो बेरुख जबाब,---"यह बेकार के चोचले मुझसे नही होते,,
हुमक सी उठी ,और दो आँसू ढलक गए गालों पर ,
आज जय जब ऑफिस जा रहा था तो कभी वह जाते हुए जय को देखती कभी अपनी कलाई पर पड़े उसके हाथों के निशान को।
फिर आहिस्ता से कह रही कभी क्यों गौर नही किया आपने मेरे ह्रदय के अनकहे जज्बों को बरना आज आपके आने से ज्यादा मुझे आपका जाना सुकून नही देता, मैं भी कहती --
मुझे तेरा प्यार जताना अच्छा लगता है,
तेरे आने पर वो तेरा कैसी हो कहना,
अच्छा लगता है।
मजबूरी है तुमसे दूर रहना
पर बहुत मुश्किल है यह जुदाई सहना,
कहकर गले लगाना अच्छा लगता है।
कितनी अहमियत है मेरे जीवन में,
तेरी यह कहकर प्यार लुटाना अच्छा लगता है।
  बस यही , हाँ यही वो चन्द अल्फाज हैं जिनकी खातिर हर औरत अपना भूत तुम्हारे सपनों में बिताती, और वर्तमान तुम्हारे साथ हर परिस्थिति में  खुश होकर जीती,
और भविष्य तुम्हारे सपनों को सजाने  में बिताती।
कितनी पगली होती हर वो औरत  चन्द मोहबतों को अपनी दुनिया बना लेती, अपने ख़्वाहिश, फरमाइश , अरे!अपना अस्तित्व भी भुला देती क्योंकि वो अपना सब कुछ तुम्हें मान बैठती है।
और कभी हालात माकूल होते तो प्यार से मुस्कुराकर ,गुनगुनाकर, शर्माकर कहती हाँ मुझे तुमसे मिलना अच्छा लगता है।

और जब परिस्थिति विपरीत होती तो,  भीगी पलकों को काजल में छिपाकर, आहों भरे होठों को समझौते की लाली में छिपाकर , इस समाज के लिए समझौते के बंधन को जीकर फरेबी दुनिया के साथ फरेब का समझौता कर बड़ी शान से अपने जमीर को दबाकर, जहन को हालातों क् हवाला देकर कहती हाँ मुझे तुम से मिलना अच्छा लगता है।
यही सोंचती सुरभि न जाने कब सो गयी गालों पर सूखे आँसूओं के धारे लेकर।
नोट--  मैं खुशनसीब हूँ जो हैं  मेरे पास मेरी परवाह करने वाला, पर असपास देखा है कि जय और सुरभि को इस तरह का जीवन जीते हुए, एक औरत चाहती क्या है बस आपके चन्द अल्फाज, चन्द तबज्जोह, और आपकी यह थोड़ी सी परवाह  आपको उसके जीवन में बहुत ही स्पेशल मुकाम दे देती।
तो कृपया एकबार जरूर अमल कीजिए , इन बातों पर की अपनी प्रिया, जब भी आपसे मिले वो मजबूरी से नही बल्कि पूरे प्रेम से पगे ह्रदय से उठते अल्फाजों से कहे,
मुझे आपसे मिलना अच्छा लगता है, प्यार से यों गुनगुनाए--
न जाओ सइयाँ छुड़ाके वईयाँ,
कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी।

अन्जू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।