गतांक से आगे  👇




" तेरी    अंतिम विदाई    पर  आज   भी 
तुमसे किया गया   वादा ही पूरा करूंगी 
जमाना मुझ  पर  लाख लांछन  लगाए 
तेरी खुशी  जिसमें हों मैं  वही करूंगी " 

मृणाल ने अपने फौजी बाबू से किया वादा उस वक्त भी निभाया जब शहीद राहुल कुमार सिन्हा को तिरंगे में लेकर उसके घर लाया गया । शहीद फौजी के अंतिम दर्शन के लिए पूरा शहर ही उमड़ पड़ा था । परिवार और आस-पड़ोस सबकी ऑंखों से ऑंसू मोतियों की तरह गिर रहें थे ... एक मृणाल ही थी जिसकी ऑंखो में ऑंसू का एक कतरा तक नहीं था ।
अपनी बेटी को गोद में लिए वह एकटक एक ओर खड़ी अपने फौजी बाबू के तिरंगे से लिपटे ताबूत को देखे ही जा रही थी ... 

राहुल के माता-पिता का करूण रूंदन सुनकर सभी ऑंखो में ऑंसू थे लेकिन मृणाल जस की तस वहाॅं ऐसे खड़ी थी जैसे वह वहाॅं होकर भी ना हों ... 

अंतिम दर्शन के लिए मृणाल को अपने फौजी बाबू के समक्ष भाभी लेकर गई वह अपने फौजी बाबू को ऐसे देख रही थी मानो उससे कुछ पूछ रही हो लेकिन किसी ने भी उसकी आवाज नहीं सुनी ... ना ही ऑंखो में ऑंसू ही देखा । हाॅं लोगों ने इतना जरूर देखा कि उसने अपनी बेटी के हाथ उसके पिता के गालों पर यूं रखा जैसे वह अपनी बेटी का स्पर्श उसके पिता को करा रही हों । 

शाम में शहीद राहुल कुमार सिन्हा को लेकर आएं कैंट के वर्दीधारी सिपाहियों को लौटना भी था इसलिए सभी ने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को जल्द करना शुरू कर दिया । श्मशान घाट में कांस्टेबल राहुल कुमार सिन्हा को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई । वहाॅं उपस्थित लोगों की ऑंखों में नमी भी थी और साथ ही अपने फौजी पर गर्व भी । 


सेना के जवानो ने राहुल के पिता से जानें की इजाजत लेने से पहले मृणाल को बुलवाया और दो लाख रूपए उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा - " मैम ! हमारे कमांडिंग ऑफिसर सर ने तत्काल आपको यह दो लाख रूपए देने के लिए कहा था । आप वाॅर विडो है इसलिए आपकों फैमिली पेंशन में आखरी तनख्वाह के बराबर ही पैसे दिए जाएंगे  । बाकी बचे और  भी पैसे जल्द ही आपको दें दिए जाएंगे साथ ही उन्होंने यह लेटर भिजवाया है और हमारे साथी की शहादत पर दुःख जताते हुए उन्होंने कहा हैं कि सेना आपका हर संभव मदद करेगी " । 

मृणाल पैसे लेने के लिए अपने हाथ बढ़ाने ही वाली थी कि राहुल की माॅं ने अपने हाथ पैसे लेने के लिए आगे बढ़ा दिए ... तुरंत ही उस सैनिक ने अपने हाथ पीछे करते हुए कहा - " साॅरी माॅंजी ! सर ने हमें मैम को पैसे देने का ऑर्डर दिया था " 

अंततः मृणाल को पैसे देकर सभी सैनिक लौट आएं । 
लेटर में क्या लिखा है ?? सास की आवाज सुनकर मृणाल ने लेटर पढ़ा जिसमें लिखा था कि सेना की तरफ से आयोजित परीक्षाओं में भाग लेकर वह अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी कर सकती हैं या अपनी संतान को करा सकती है । 

यह नौकरी करेगी ?? ... दसवीं पास को नौकरी मिलेगी ... दोनों माॅं - बेटी ने मिलकर मेरे बेटे को मुझसे छीन लिया ... मेरे बेटे की जिंदगी में जब से यह आई तभी से सारे ग्रह - नक्षत्र उसके जिंदगी में आने लगे थे और इसकी बेटी ने तों जन्म लेने के दस दिन के अंदर ही मेरे बेटे को खा लिया ... आज मैं इसकी बेटी को मार ही दूंगी ... सास को तेजी से अपने कमरे की तरफ जाता देख मृणाल डरकर  उनके  पीछे भागी । 


माॅंजी ! मेरी बेटी को छोड़ दीजिए ... आप जों भी और जैसा कहेंगी मैं करने के लिए तैयार हूॅं ... आप कुछ नही करेंगी ... कहते हुए मृणाल सास के पैरों में गिर पड़ी । 

राहुल के पिता और भाई भी कमरें में आ चुके थे और उन्होंने बच्चे को मृणाल की सास के हाथों से छीन कर मृणाल की गोद में रख दिया । 

दो लाख जों तुम्हें पैसे मिले हैं वह इधर दो और मैंने सुना है शहीद को और भी पैसे सेना देती है जों भी पैसे मिलेगा और जिस दिन मिलेगा वह हमें देकर अगले ही दिन अपने मायके चली जाना ... मुझे तुम 
दोनों मनहूस की शक्ल अपने घर में नहीं देखनी हैं ... कहते हुए मृणाल की सास कमरें से बाहर निकल जाती है । 

यह तुम क्या कह रही हों ?? उस बच्ची में हमारे राहुल का अंश है ... मृणाल के ससुर जी ने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा । 

वह लड़की हैं ... लड़का होती तभी तों हमारे खानदान का नाम आगे बढ़ाती ... लड़कों से खानदान और खानदान का नाम बढ़ता है लड़कियों से कुछ नहीं होता । यह दोनों यहाॅं रहेगी तों मैं मर जाऊंगी ... गुस्से में मृणाल की सास ने कहा । 



मृणाल की सास के जातें ही मृणाल ने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया । बहुत देर तक उस नन्ही परी को छाती से लगाएं वह रोती रही । 



" अबला जीवन हाय  तुम्हारी यही कहानी
  ऑंचल  में  हैं  दूध‌ और ऑंखों में पानी "

मैथिलीशरण गुप्त द्वारा नारी की स्थिति पर लिखी यह लाइनें आज मृणाल की जिंदगी से हू - ब - हू मेल खा रही थी । मृणाल का जीवन यदि हम उठाकर देखे तों बचपन से ही इसने दूसरों के लिए जिया था ... माॅं की मृत्यु के बाद मायके में अपने छोटे भाई की माॅं तक बनकर  उसने   उसकी   परवरिश की    थी । अपनी जिंदगी के तीस साल उसने अभावों में बीता दिए थें । पिछले कुछ महीनों से एक देवदूत  ने उसकी जिंदगी को खुशियों से भरना शुरू ही किया था कि उसे भी ईश्वर ने अपने पास बुला लिया था । आज मृणाल के ऑंचल में तो जिंदगी देने वाला दूध है  लेकिन ऑंखो में वही ऑंसू है जों पहले थे । उन ऑंसूओं को पोंछने वाला अब कोई नहीं । 



मृणाल की व्यथित पुकार को समझने वाला कोई नहीं था ... जों समझता था उसे ईश्वर ने उससे छीन लिया था और कुछ लोग थे जो समझ कर भी अनजान बने थे .. उन सब ने मौन धारण कर लिया था । 

मृणाल के भीतर भी दुख था ... पीड़ा थी और वेदना थी । मृणाल जैसी स्त्रियों के दुख , पीड़ा और  वेदना   को   देखते  हुए   ही   तों  महादेवी  वर्मा  ने  लिखा  है 👇

" मैं  नीर  भरी दुख  की   बदली 
  कल उमड़ी थी आज मिट चली " । 

मृणाल अपने फौजी बाबू को याद कर अकेले में रोने लगती । राहुल से किया वादा उसने कभी भी नहीं तोड़ा था । जमाने ने और परिवार के लोगों ने उसे पत्थर दिल , चालाक , चालबाज और ना जाने क्या क्या कहकर तानें मारे थे लेकिन आज तक उसने पलट कर किसी को ज़वाब नहीं दिया था । 

सबके सामने जिस मृणाल की ऑंखो से ऑंसू का एक कतरा तक नहीं गिरता था अपने कमरे में दरवाजा बंद करते ही वह घंटों तक ऑंसू बहाती रहती थी । कभी ईश्वर को कोसती तों कभी राहुल को । 


मैंने तों तुम्हें अपनी हर धड़कन , हर एक सांस में बसाया था ... पल - पल तेरे ही चेहरे को अपनी ऑंखो में छुपाती रहती थी .. होंठों पर सिर्फ अपने फौजी बाबू का ही नाम रहता था .. मेरी जिंदगी में देवदूत की तरह आने के बाद मैं ईश्वर से पहले तुम्हें ही याद करती थी लेकिन ना जाने मुझसे ऐसी कौन सी गलती हो गई कि तुम मुझसे रूठकर इतनी दूर चलें गए ... इतना सुन लो फौजी बाबू ! मैं तुम्हें कभी भी माफ़ नहीं करूंगी इस शरारत के लिए ... घंटों अपनी बेटी को गोद में ले मृणाल बुदबुदाती रहती । 


क्रमशः 


" गुॅंजन कमल " 💗💞💓