कुंती से अब चला भी नहीं जा रहा था।एक पेड़ के नीचे वो लोग बैठ गए।भीम पानी लेने गया ,जब लौट कर आया तो सभी सो गए थे,उसने उन्हें जगाना सही नहीं समझा और वहीं जागकर पहरा देने लगा।

हिडिंब को मनुष्य की गंध लग चुकी थी ,इसीलिए उसने हिडिंबा को उन लोगों का शिकार करने को भेजा था।


हिडिंबा जब उनलोगो के कुछ  निकट आई ,तो वहां बैठे भीम पर उसकी नजर पड़ी ,और वह उसे देखते ही रह गई,असाधारण रूप से बलिष्ठ,हृष्ट पुष्ट,चेहरे पर बाल सुलभ मासूमियत वह भूल गई कि वो किसलिए आई है।
उसकी आंखें मुग्ध हो भीम के  चेहरे और शरीर को निहारना चाहती थीं,उसका तन वासना की आग में जलने लगा।उसने मांस खाने की इच्छा का त्याग कर,अपने कंठ में पड़े हड्डियों  को माला उतार फैंकी,बिखरे केशो को समेट वेणी बना ली,और केशो में कुछ फूल लगा लिए।



अपने उधड़े बदन को उत्तरीय से ढंक लिया।
अब हिडिंबा भीम के करीब आकर खड़ी हो गई।
आहट हुई तो भीम ने आंख उठा कर देखा
एक स्त्री उसे अपलक निहार रही है।
भीम ने उससे पूछा _ कौन हो देवी? इस तरह इस वन में क्यों विचर रही हो।

पहले ये बताओ ये जमीन पर लेटे पुरुष और वह नारी कौन है?_हिडिंबा ने पूछा।

क्यों?क्या तुम कोई गुप्तचर हो? भीम ने पूछा।
नहीं मै तो ऐसे ही जानना चाहती थी।_हिडिंबा ने कहा।

तुम्हारे लिए इतना जानना काफी है , कि ये  मेरे भाई हैं,और वो भद्र नारी मेरी माता,अब तुम अपना परिचय दो?_भीम ने कहा।

मैं इस असुरराज हिडिंब की बहन ,हिडिंबा हूं।मेरे भाई ने तुमलोगों का वध करने के लिए मुझे भेजा है,जिससे वो नर मांस खा सके_ हिडिंबा ने कहा।
इतना सटीक और सीधा जवाब सुन कर भीम अचंभित हो गया।
तो फिर वध क्यों नहीं करती?_भीम ने कहा।

मैं तुमलोगों को  खा कर क्षणिक क्षुधा शांत नहीं करना चाहती बल्कि मैं तुम्हें स्थाई रूप से वरण करना चाहती हूं।
मैं तुमसे विवाह करना चाहती हूं।

इससे पहले की मेरा भाई यहां आ जाए ,तुम सबको जगा दो,मैं तुम लोगों को इस वन के सुरक्षित भाग में पहुंचा दूंगी, शीघ्रता करो_हिडिंबा ने कहा।

आने दो ,तुम्हारे भाई को ,मैं किसी से नहीं डरता _भीम ने कहा।

पर मेरा भाई बहुत शक्तिशाली  और नरभक्षी है _हिडिंबा ने डरते हुए कहा।

उधर मानव गंध उपर से हिडिंबा के बिलंब से हिडिंब की  भूख की तीव्रता बढ़ती जा रही थी,और वह गुस्से से बेकाबू हो रहा था ।

अतिशय क्षुधा और क्रोध से वह पेड़ से उतरा और उनलोगो की ओर बढ़ा।
तभी भीम ने पेड़ों के झुरमुट से एक विकराल दीर्घकाय आकृति को अपनी तरफ आते देखा।

स्थूलकाय शरीर ,कुरूप ,हड्डियों की माला पहने , उदर पर मांस लटकते भयानक नजर आ रहा था।

आर्य आपलोग भाग जाएं,मेरा भाई आ रहा_ हिडिंबा चिल्लाई।
हिडिंब तेजी से कुंती और सोए भाइयों की तरफ न बढ़ कर  हिडिंबा की तरफ बढ़ा,
दुष्ट तू शिकार न लाकर ,यहां प्रेमालाप कर रही थी, अब मैं तुझे नहीं छोडूंगा।

और वो हिडिंबा पर टूट पड़ा।शोर गुल से सभी की आंखें खुल गईं।अर्जुन ने तुरंत अपना धनुष उठाया।

रूक जाओ अर्जुन ,ये मेरा शिकार है,बहुत दिनों से मैने वर्जिश भी नहीं की ।मेरा अंग अंग किसी को तोड़ने को मचल रहा।

भीम और हिडिंब का युद्ध होने लगा ,कभी हिडिंब भीम पर हावी हो जाता तो कभी भीम ,हिडिंब पर।
दोनों के बीच युद्ध होता देख ,हिडिंबा परेशान हो रही थी।
आखिरकार भीम ने हिडिंब को उठा कर जमीन पर दे मारा ।
पृथ्वी पर पड़ते ही हिडिंब निष्क्रिय हो बहुत देर तक पड़ा रहा ।
बहुत देर तक जब उसमे कोई गति नहीं हुई तब धीरे धीरे सभी ये सुनिश्चित करने उसके पास गए कि वह वास्तव में मृत्यु को प्राप्त हुआ है या यूं ही नाटक कर रहा।

हिडिंब के प्राण पखेरू उड़ गए थे।



हिडिंबा हतप्रभ हुई ,भाई को देख रही थी। आततायी था,हिंसक था,दुष्ट था ,जैसा भी था उसका भाई था,उसका संबल ।
उसके अलावा कोई भी तो नहीं था उसका ,एक दम अकेली।
राक्षस विधान के अनुसार वह अपने लिए पति का चयन कर सकती थी,अपने भाई के हत्यारे से विवाह हो सकता था।
लेकिन मानव जाति के अपने नियम थे,इतने अनुनय विनय के बाद उसने 1 साल के लिए भीम के साथ सहचरी बनने का मौका मिला है।

आश्रम पहुंचकर वह जैसे नींद से जागी।
कुंती ने पुत्रों से कहा , वे जाकर मुनि को प्रणाम कर आएं।
हिडिंबा ने प्रश्न किया _क्यों माता ?

कुंती ने उत्तर दिया _यह आश्रम का प्रदेश है,हमें सर्वप्रथम मुनि से रुकने की आज्ञा लेकर ही आगे किसी गतिविधि का निर्वहन करने को सोचना होगा।

हिडिंबा चुप हो गई।
पांचों भाई ,मुनि को प्रणाम करने गए।

मुनि ने सबको आशीर्वाद दिया ,और उनका परिचय पूछा।
युधिष्ठिर ने कहा_मुनिवर ,हम किसी कारण अपना परिचय इस समय नहीं दे पा रहे ,बस आपको इतना ही बता सकते हैं कि हम अन्याय,और अधर्म से पीड़ित एक साधारण वनवासी हैं।क्या कुछ समय के लिए यहां आप रुकने की अनुमति देंगे?

क्रमशः