हर पल मन में सपनों का एक नया समंदर होता ।
मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर सा होता ।।

हम रहते हैं इसी धरा पर किंतु चांद पर जाना ।
मेरी आंखों ने देखा फिर से एक ख्वाब पुराना ।।

क्या हम नीले आसमान में पंछी बन उड़ पाएंगे ।
या फिर मेरे सारे ख्वाब अधूरे ही रह जाएंगे ।।

मेरी आंखों ने ख्वाबों का नया जहां अब देखा ।
मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर होता ।।

मेरा मन अब सपनों में हर पल ही तो तपता ।
खूब रोकना चाहू पर मेरा मन कब रूकता ।।

अपने मन को तुम ही बोलो कैसे मैं समझाऊं ।
ख्वाबो के सैलाब को अब कैसे मैं रोक पाऊं ।।

मेरा मन तो हर पल ही सपनों की धुन में खोता ।
मेरे दिल में बहुत बड़ा ख्वाबों का मंजर होता ।।

नाम - विक्रांत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)