मालूम है मुझे नारी हूँ ,
पर पता नहीं कौन हूँ मैं ??
मैं पुत्री हूँ, मेरी पवित्रता पिता का मान है,
बहन हूँ, तो मर्यादा भाई की शान है,
मैं  पत्नी हूँ, मंगलसूत्र पति के प्राण हैं, 
माता हूँ, ममता पुत्र का अभिमान है, 
रिश्तों को पहचान देते देते भूल चुकी
क्या मेरी अपनी पहचान है !! 

गर्व था मुझे कि गंगा हूँ-
 मैं जीवनदायिनी हूँ, 
भूल गयी कि जीवन तो संसार का है 
मैं तो न संसार हूँ, न ही संसार में हूँ 
गर्व था मुझे कि मैं दुर्गा हूँ, पूजनीय हूँ, 
भूल गयी कि इच्छा पूर्ति के बाद 
विसर्जित कर दी जाती हूँ ..!!

क्यूँ मैं अपनी कुछ भी नहीं ?
सब का सहारा बन सकती हूँ 
क्यूँ बस खुद अपना ही सहारा नहीं!! 

गर्व था मुझे की मैं शक्ति हूँ.. 
जानती हूँ - मैं शक्ति हूँ!! 
भूल गयी कि--
मैं शिव की  हूँ..स्वयं की नहीं।

मेरी शक्ति से शिव ''शिव'' हुए 
क्यूँ मेरी शक्ति पर मेरी ही नहीं !!
मालूम है कि नारी हूँ मैं-- 
सबकी सबकुछ हूँ मगर
स्वयं की मैं कुछ भी नहीं!!  


स्वरचित- शालिनी अग्रवाल 
जलंधर