मैंने जो अनुभव किया है शायद आपमें से भी कुछ ने वैसा अनुभव किया हो।उसी अनुभव को मैं आप लोगों से साझा कर रही हूँ।
सासुराल जब आई थी तब सोचा था एक ही तो सास होती है ,माँ मान कर उसकी बहुत सेवा करूंगी।
विचार तो विचार ही होता है ।सच के साथ उसका हमेशा तो तालमेल नहीं बैठता।
बस ऐसा ही हुआ।कुछ दिन तक तो सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा।सास जो भी कहतीं ध्यान से सुनती और उस पर अमल करने की कोशिश करती।
माजरा कुछ और ही निकला।सबने बड़ी तारीफ की कि बहु तो बड़ी सोनी है सासू जी की सेवा कर उन्हें खुश रखती है।
अब जो देखा तो सासुराल की हर स्त्री अपने को मेरी सास ही समझने लगी।उनको उम्मीद थी कि मैं उन लोगों की सेवा कर समय बे समय खुश रखूंगी।
सास की सहेलियां,बुजुर्ग पडोसनें, छोटी बड़ी ननदें सभी ने फिर तो स्वयं को अघोषित सास की पदवी दे डाली।मुझे भी सबका मान सम्मान उसी तरह करना पड़ता था।जिठानी जरूर हमदर्दी रखतीं थीं क्योंकि वह भी मेरी ही श्रेणी में आती थीं।
अघोषित साँसें समय समय पर राय मश्विरा देती रहतीं।समय कुसमय आदेश पारित कर देती साथ ही दिशानिर्देश भी।
नंदों को तो पूरा अधिकार होता था अच्छा बुरा बताते रहने का। कभी कभी तो मुझे कहना पड़ जाता
""जीजी आप नंद है नंद ही रहें ,सास बनने की कोशिश मत कीजिए।""
कोई बात नहीं, सबके साथ ऐसा ही होता होगा सोचकर अपने को शांत कर लेती थी।
सबकी इच्छाएं पूरी करती रही सिवा अपनी इच्छा के। सासों को तो यह सब समझने की जरूरत ही नहीं थी।
समय किसी का इंतजार नहीं करता है पर मैंने समय का इंतजार किया।नंदों की शादी हो गईं।बुजुर्ग पडोसनो को भगवान ने याद कर लिया।मेरी इकलौती सास भी हम सब को छोड़ कर भगवान को प्यारी हो गईं।
समय अपनी रफ्तार से खिसकता रहा।नौकरीपेशा पति अब रिटायर होकर घर पर आराम फरमा रहे थे।काम करने और मातहतों को हरदम आदेश देने वाले पति कब शांत रहने वाले थे।अफसरी का कीड़ा अभी भी फल फूल रहा था।बस लक्ष्य बदल गए थे।अब उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की जगह मैंने ले ली थी।
सारे दिन उनके आदेश सुनती रहती।यह यहाँ क्यों रखा है?
यह ऐसा क्यों नहीं है?अरे यह क्या कर दिया?
अबतो लगने लगा था कि शायद मैंने जितनी भी जिंदगी गुजारी है या तो गलतियाँ करते हुए गुजारी है या फिर मुझे कुछ आता ही नहीं था।
एक दिन दुखी होकर कहना ही पड़ा ,""जनाब, आप पति हैं पति ही रहिए सास मत बनिये।""
मुझे भी तो कुछ अपने जैसा करने की आजादी मिले।थक गई
हूँ सबकी मर्जी पूरी करते करते।
सास तो मैं भी बन गई हूं पर अपनी बहू को उन अघोषित सासों की यातनाओं से बचा कर रखती हूं।
रेनु सिंह

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