विज्ञान से कुछ दूर से
अपने ही मद में चूर से
वो जी रहे हैं जिंदगी
कुछ हैं कबीले दूर से

भले दूर वो विज्ञान से
और कुछ परे हैं ज्ञान से
सीने में भी है उनके दिल
हैं वो भी एक इंसान से

हैं वो प्रकृति के करीब 
क्या खूब है उनका नसीब
वो जी रहे हैं शान से
हैं दूर वो अभिमान से

जंगल ही डेरा उनकाहै
यहीं पे बसेरा उनका है
मिल जुल के रहते है यहां
कुछ लोग वो गुमनाम से

नही कोई उनकी शिक्षा है
जीवन की दी हर परीक्षा है
वो लोग भी है गुणवान से 
हैं दुनिया में अंजान से।

कविता गौतम✍️