" अब हंस दे मेरी रज्जो ...।" ये आंसू मेरे दिल के टुकड़े हैं इसे यूं न बहाया कर। शामू मेरा भरोसा मत तोड़ना कभी-..." कहते हुए रजिया श्याम के गले लग गइ।"
(श्याम जिसे रजिया प्यार से शामू कहती थी। )
(श्याम रजिया को रज्जो कहता था )
'भरोसा नहीं तोड़ता मैं, तेरा मुंह अभी तोडूंगा..फिर मेरे सामने आंसू निकाली तो .. । " श्याम हंसते हुए बोला!
अरे ! पगली और लड़को जैसा समझ लिया है मुझे ? जो प्रेग्नेंसी के नाम से हीं लड़की से पीछा छुड़ाने लगते हैं। वो हमारा प्रिंस होगा या मेरी क्वीन...और मैं तुझे रजिया श्याम सिंह बनाऊंगा।
' श्याम ने पूर्ण निश्चय के साथ कहा।"
अरे! इतना आसान नहीं है हमें रजिया श्याम सिंह बनाना ..हमारे बीच मजहब की दिवार है ..समाज हमें बहिष्कृत कर देगा ।" रजिया ने उदास स्वर में कहा-"
अरे ! " किस समाज की बात कर रही है तू ..? वो जो शहनाई बजने पर प्यार की पूजा करते हैं.." जिनके लिए दिल का मतलब सिर्फ खिलौना ..या ,समझौता करना होता है...?
बोल रज़िया - हर शादी में प्यार नहीं होता..? और हर प्यार की मंजिल शादी नहीं होती..? पर समाज़ के ठेकेदार इसे महसूस नहीं करते ..महसूस करते हैं वो दिल जो सर्वस्व न्योछावर कर के भी मुस्कुराते हुए जीना चाहते हैं।"
ख़ुदा ने तो सिर्फ इंसान बनाया .."
ये मज़हब की दिवार इंसानो के ढकोसले हैं..." मैं नहीं मानता कोई जाति -बंधन ...।"
बोल लिया तुमने..? रजिया ने कहा!
हाँ ,क्यूँ नहीं अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर मानव के लिए है ..।" तुम भी बोल सकती हो ...?
अच्छा ! तो मुझे कुंवारी मां नहीं बनना। कब कर रहे हो मुझसे निकाह...?
अभी! आज हीं ..!
इतनी जल्दी नहीं, अपने घर वालों से अनुमति लो पहले ...?
नहीं ! रज्जो .." मैंने अपने आत्मा की आवाज सुनी है ..जहाँ परमात्मा विराजमान होता है। अभी चलो मंदिर...।" रज्जो कुछ बोले उससे पहले शामू रज्जो का हाथ पकड़े मंदिर में प्रवेश करता है ...।"
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आज से आप दोनों वर-वधु बन गए। पंडित ने आशीर्वाद दिया। ये सुहाग की डिब्बी आप संभाल के रखिये ..। औरत का धरोहर और पति का स्वरूप है ये सुहाग की डिब्बी।
रजिया सुहाग की डिब्बी अपने दुपट्टे में छुपा लेती है।
रज्जो-श्याम मंदिर से बाहर आते हैं ...तभी श्याम की पड़ोसन शीला बुआ से उनका सामना होता है..।
शीला बुआ हैरत से श्याम को देखती है...अनेकानेक प्रश्न मन में आ रहे हैं। उनके पुछने से पहले ही श्याम बोल पड़ता है-"
ये मेरी पत्नी - रजिया "
और ये मेरे शौहर-- श्याम " रजिया हंसते हुए बोल पड़ी।"
तू जल्दी छूप कहीं ...इधर..." मेरे घर वाले आ रहे हैं यहीं पर ।" शीला बुआ घबराये हुए स्वर में बोली ...।" क्योंकि शीला बुआ के पति एक जाने-माने पत्रकार थे .." कहीं उनकी कलम उठ गई तो ...? बुवा को अनजान सा भय सताने लगा..।"
उन्हें रजिया का मुस्लिम होना पता था। कहीं बवाल न हो जाए...?
रजिया और श्याम मंदिर की दूसरी तरफ छुप गए और आते हुए लोगों को देखने लगे।
सबने मंदिर में दर्शन किया, फिर शीला बुआ अपने पति के साथ ससुराल गई और बाकी लोग पुनः अपने घर को चले गए।
शामू! घर को देर हो रही है। मैं निकलती हूं.. ।"
रजिया बोल पड़ी।"
अरे! अभी कैसे जाएगी ? आज हमारी शादी हुई है .." एक हसीन मुलाकात तो होना ही चाहिए ..." श्याम शरारत से बोल पड़ा... .।"
अच्छा! बाबा अब तो बस तेरी ही हूं । कर लेना मुलाकात अगले दिन।
ना- ना .. सिर्फ मेरी नहीं, मेरे होने वाले प्रिंस की मम्मी भी ..।"
अच्छा! कैसे बुलाएगी तू मुझे,,जब प्रिंस आ जाएगा..?
शामू ! आ.. प्रिंस रो रहा है ..।" कहते हुए रजिया खिलखिला कर हँस पड़ी।
अब जाउँ..?
नहीं ! दो घड़ी और बातें करते हैं न;
शामू ! तू जानता है न;
अब्बू तो थोड़ा डांटते है, पर अम्मी खाल उधेड़ देगी ..।कहते हुए रजिया की आंखे नम हो जाती है..।
तेरे अब्बू खूंखार सौतेली अम्मी क्यूँ लाए तेरे लिए ..? जो तूझे इतना टॉर्चर करती है।
मत बोल कुछ! वो जैसी भी है , अम्मी कहने से मुझे बहुत सुकून मिलता है; सौतेली हैं तो क्या हुआ मैं अनाथ तो नहीं हूँ।
अब मैं चलूं..?
क्यूँ जाने की बात करके दिल पे छूरी चलाती है ..?
अरे! दुनिया से नहीं जा रही मैं .." हंसते हुए बोल पड़ी रज्जो ..।"
पर मेरी दुनिया तू ही है रज्जो, कहीं मैं न दुनिया छोड़ दूँ तुझसे दूर जा के..।"
ऐसा न बोल शामू .. " दिल धक-धक करने लगा मेरा..।"
अच्छा! कल मिलते हैं फिर ..।"
एक बात और सुन!
हाँ!जल्दी बोल ..?
ओ मेरी रज्जो...."
".मुझे अपने आंसू हीं बना ले जब चाहेगी निकाल देगी .. "
तेरे दिल से तो निकलने का दरवाजा हीं नहीं मिलता.. । "
वाह! क्या शेर मारा है -- " मेरे हीरो .."
हंसते हुए रजिया वहां से निकल जाती है।
श्याम उसे जाते हुए देखता है ।
श्याम भी मंदिर से बाहर आता है तभी उसकी नज़र सुहाग की डिब्बी पर पड़ती है; शायद जल्दी में रजिया से गिर गयी होगी ।
वो रजिया को आवाज़ देते हुए भागता है.. ।
वो आंखों से ओझल हो जाती है ..।
और शामू तीव्र गति से दौड़ते हुए एक ट्रक के नीचे आ जाता है,वहीं उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है।
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इतनी देर से क्यूँ आ रही है तू ..?
ये सब काम कब होगा .. ? अम्मी ने दांत पीसते हुए कहा!
अभी करती हूँ अम्मी .."
रजिया ने कपड़े बदले और काम करने लगी ..रात के ग्यारह बजे तक रजिया ने अपना काम निपटाया ।
जब वो बिस्तर पर आइ तब उसे सुहाग की डिब्बी याद आई।
रजिया ने काफी खोजा पर डिब्बी नहीं मिली।
रजिया का मन किसी अनहोनी की आशंका से व्याकुल हो उठा।
किसी तरह रात कट जाए वो फिर मंदिर जाएगी, और डिब्बी ले कर आएगी। पंडित जी ने कहा भी है कि- " सुहाग की डिब्बी औरत का धरोहर और पति का स्वरूप है। " एक सुखद स्वप्न सजाए रजिया बिस्तर पर निढाल पड़ गई। सुबह के इंतज़ार में रात भी लंबी हो गई।
फिर नियति का कुचक्र ऐसा चला ,सुबह भागती हुई रजिया उस स्थान पर पहूंची जहां सड़क के किनारे पड़ी सुहाग की डिब्बी अपने निर्जीवता की साक्षी बन रही थी। शामू की मौत ने रजिया को एक जींदा लाश बना दिया। वो अर्द्धविक्षिप्त हो गई।
उसे यह भी याद नहीं रहा कि उसका प्यार प्रिंस बन कर उसके पेट में पल रहा है। सौतेली अम्मी को सिर्फ घर के काम से मतलब था जो वो करती रहती थी। कभी रोती, कभी हंसती, और कभी..' शामू आ प्रिंस रो रहा है। " कोई उसकी बात पर ध्यान नहीं देता।
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उसका अब्बा जो उससे पैदाईशी नफ़रत करता था। चार दिन की थी रजिया जब अम्मी गंभीर बीमारी से चल बसी। अम्मी ने अब्बू से मिन्नत की थी .. .." रजिया की अम्मी बन के रहना तुम..।" पर अब्बू रजिया को कमरे में बंद कर देता ,और रोता छोड़ कहीं निकल जाता।
कुछ दिन तक पडोसियों ने पाला रजिया को, फिर सबके सहमति से अब्बू नई अम्मी ले कर आये। फिर रजिया के साथ खेलने के लिए एक बहन भी हुई जिसका नाम नई अम्मी ने सोहा रखा। जो चीज सोहा रिजेक्ट करती ,वही रजिया को मिलता। रजिया ने पांचवी जमात तक पढ़ा.. फिर अब्बू ने सख्त रोक लगा दी।
आखिर सोहा को स्कूल भेजना है..घर का कार्य कौन करेगा..? रजिया को किसी से कोई द्वेष भाव नहीं था। अम्मी और बहन की सेवा के बाद रजिया मंदिर जाती और लौटते समय लकड़ियों का गट्ठर साथ ले कर आती। यूं तो अब्बू एक सरकारी कर्मचारी थे एक संपन्न परिवार था ... पर अम्मी को रजिया का खाली टाईम में आराम करना बर्दाश्त नहीं था ..इसलिए रजिया को लकड़ी रोज लाना पड़ता,...जिसे अम्मी बेचती और पैसे मिल जाते।
इसी रास्ते में श्याम से रजिया की पहली मुलाकात हुई थी।
जब रजिया लकड़ी इकट्ठा करते हुए पसीने से तर हो गई थी तब श्याम ने पानी का बोतल देते हुए कहा- सर ढक कर निकला करो इतनी धूप में ..बीमार हो जाओगी ..।"
रजिया ने पानी पिया, धन्यवाद् कहा और आगे बढ़ गई। रजिया भोली शक्ल-सूरत की अंतर्मुखी लड़की थी। एक दिन रजिया लकड़ी इकट्ठा कर रही थी तभी बारिश शुरू हो गई। रजिया भागते हुए मंदिर के बरामदे में जा खड़ी हुई, पुनः श्याम से उसका सामना हुआ रजिया ने नजरें झुका ली, और श्याम ने पुनः उसे टोक दिया..। अरे! जब बारिश में काम हीं करना है तो छतरी ले कर निकला करो। तुम्हारे कपड़े गीले हो गए हैं। बीमार पड़ जाओगी।
रजिया को कभी अपनों से उचित सम्मान नहीं मिला था, इतना ख्याल रखने वाला था भी कौन? जो उसके बीमार होने की फिक्र करता। मुझे आदत है भिगने की ..मुस्कुराते हुए बोल पड़ी रजिया .. ." फिर श्याम और रजिया के बातों का सिलसिला बढा .." .श्याम के प्यार में वो कब अपना सर्वस्व हार गई उसे पता भी नहीं चला..।
श्याम लकड़ियाँ इकट्ठा करने में रजिया की मदद करता। पुनः अगले दिन मिलने की योजना बनाई जाती । श्याम जल्दी ही रजिया को अपनी दुल्हन बनाने का वादा करता ..।" इन्ही खयालो में रजिया खोई रहती, अब उसे अपनी जींदगी में प्यार की कमी नहीं खलती थी। कोई तो है जो रजिया की फिक्र करता है ।
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रजिया की जींदगी में अभी तुफान आना बाकी था। चंद दिनों बाद रजिया को मार्निग सीकनेस शुरू हो गया। अम्मी की नजरों से ये बात छुपी नहीं रहती, ये बात तो आखिर कभी -न -कभी खुलनी हीं थी ।अम्मी ने लात घूसो की बारिश की और पूछ-ताछ करने लगी ।पर रजिया कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं थी। आखिरकार मां ने रजिया के अब्बू से सारी बातें बताई। अब्बू चीख पड़े..। मैं रजिया की अम्मी नहीं बन सका लेकिन तुम्हे तो रजिया की अम्मी बना कर हीं लाया । ये तो पागल है, पर तुम्हे तो नज़र रखनी चाहिए थी इसपर.. मैं किसी डाॅक्टर से मिलकर बच्चा अबाॅर्ड कराउगा फिर इसका निकाह करूंगा। डाॅक्टर का नाम सुनकर रजिया ने चिल्लाना शुरू कर दिया। मेरा निकाह हो गया है ... .। मेरा बच्चा कोई नहीं मार सकता .. रजिया जोर-जोर से रोने लगी अम्मी ने फिर रजिया का बाल पकड़ कर घसीटा और कमरे में बंद कर दिया। रजिया फिर से बोल पड़ी .." 'शामू आ . , प्रिंस रो रहा है..।" कहते-कहते कभी हंसती कभी रोती रही ।
सुबह अम्मी ने रजिया को जगाया और कहा-"जल्दी से अपना काम करके तैयार हो जा, डाॅक्टर के पास जाना है और वहां,मुंह भी मत खोलना।
रजिया के आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे।
अम्मी और अब्बू के साथ रजिया अस्पताल पहुंची, और मौका देख अम्मी अब्बू को छोड़ वहां से घर भाग आई। मार खाना तो उसका नसीब बन चुका था, पर वो किसी भी सूरत में अपने प्रिंस को नहीं मारना चाहती थी, जो एकमात्र उसके प्यार की निशानी और जीनेकी उम्मीद था। इधर अम्मी अब्बू की चिंता बढ़ती जा रही थी, बिरादरी वाले धक्के मार कर भगा देंगे यदि किसी ने जान लिया तो..। " रजिया समझ गई थी -
सच्चे प्रेमियों के लिए दुनिया ऐसी हीं होती है..। " हंसते थे, तो शामू साथ होता आज रोने के लिए हमे अकेले छोड़ गया। "
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तीसरा महीना लगने को था ..रजिया को समझा कर मारपीट कर अब्बू अम्मी थक गए थे ..पर वो सबको मात दे रही थी। आखिरकार अम्मी ने एक भयानक फैसला किया। अब्बू से अपनी योजना बताई..।अब यही चारा बचा है अपनी नाक बचाने के लिए।
रात गहराने लगी..अम्मी ने अपनी योजना के अंतर्गत रजिया को समझ सोहा के मुंह को तकिये से दबाया ...।" यह देख रजिया चीख पड़ी ..अम्मी सोहा को छोड़ दो। उसने सोहा को छोड़कर अब रजिया पर हमला किया। रजिया भागते हुए अपने प्राणों की भीख मांगने लगी। अम्मी ने दूसरा तरीका इजाद किया रजिया को पकड़ जहर की शीशी मुंह में उड़ेल दिया। पर रजिया ने धक्के दिये और उठ खड़ी हुई..। सारा जहर बाहर आ गया। रजिया ने पैर पकड़ लिए। अम्मी एक बार प्रिंस को आ जाने दो,मैं आपका घर छोड़ दूंगी.. मैं मातृत्व सुख पाना चाहती हूं अम्मी ।
अभी निकल जा इसी वक्त .." यहाँ तू हमसबके लिए एक शूल बन कर जीयेगी..। और जीवित भी मत रहना ...," जिस दिन सामने पड़ी उसी दिन मैं तुम्हें खत्म करूंगी...।" अम्मी ने सख्त हिदायत दी।
और धक्के मार कर रजिया को बाहर ढकेलने लगी । इन सभी घटना क्रम की चश्मदीद गवाह सोहा थी, जो डरी-सहमी किनारे खड़ी थी. । रजिया ने जान बचाने के लिए घर छोड़कर जाना हीं ठिक समझा। बिना कुछ कहे अपने कपड़े समेटे ,और जान से भी कीमती सुहाग की डिब्बी को छुपाया और रात के अंधेरे में घर से निकल पड़ी।
अम्मी की बात " जीवित मत रहना .." बार-बार उसके अंतर्मन को झकझोर रहा था।
वीरान राहों से होते हुए रजिया चलती जा रही थी। न सफर का अंदाजा न मंजिल का पता था। रात के अंधेरे में वो एक पुलिया से टकराई ,नीचे देखा गहरा पानी शायद यहीं तक सफर था उसका। अपने पुराने कपड़े पुलिया पर रख उसने हाथों में सुहाग की डिब्बी ली और छलांग लगाने के लिए पैर आगे की तरफ बढ़ाया।
सहसा किसी ने उसे पीछे की तरफ धक्का दिया-वो पुलिया से नीचे गिर पड़ी। सामने एक पुरूष को देख वो सुखे वृक्ष की भांति कांपने लगी।
कौन हो तुम लड़की ?
क्यूँ मरना चाहती हो ? पुरुष ने प्रश्न किया।
मैं नहीं जी सकती..अगर जीवित रही तो अम्मी ... "
कहते- कहते वह फूट-फूट कर रोने लगी।
मैं तुम्हें नहीं मरने दूंगा। तुम मुझसे बिलकुल मत डरो और पूरी बात बताओ। अगर मुझसे कोई सहयोग चाहिए तो...?
सहयोग ..? पर आप हैं कौन?
मैं एक पत्रकार हूं ,, पियुष नाम है मेरा .. ।" तुम्हारी गतिविधियों को देखकर मुझे आशंका हुई और मैं यहाँ तक आ गया।
मेरी जिजीविषा अब खत्म हो गइ है। मुझे अपने सूहाग का तर्पण करना है ...। मुझे इस डिब्बी के साथ जल में विलीन होने दो ..।
शुरू से बताओ ,,,क्या हुआ है तुम्हारे साथ?
रजिया ने अपनी पूरी कहानी उन्हे बताई और आग्रह किया .. यदि आप सहयोग करना चाहते हैं तो मेरे मरने की खबर कल के अखबार में होनी चाहिये।
ये मेरे कपड़े इस बात का प्रमाण होंगे।
रजिया की मनःस्थिति को भांप पियुष ने हाँ कर दिया।
पर अकेले तुम जाओगी कहाँ..? जहाँ किस्मत ले कर जाये ..।
नहीं ! तुम चाहो तो हमारी ताइ के पास रह सकती हो।
नहीं ! मैं मनहूस हूं, पहले मां, फिर शौहर और अब मैं किसी और की बदकिस्मती बनना नहीं चाहती हूं। रजिया फिर से जार-जार रोने लगी।
ठीक है! मैं तुम्हें फोर्स नहीं करता, पर कसम हमारी तुम फिर खुदकशी का यत्न नहीं करोगी..?
रजिया ने सर हिला कर मौन स्वीकृति दी।
तुम जा सकती हो-" मैंने तुम्हें मरने से रोका ,पर दुनिया अकेली औरत को जीने नहीं देती है। ये मेरा कार्ड लो कभी आवश्यकता पड़े तो संपर्क करना।"
रजिया वहां से निकल पड़ी। अब वो पियुष के आंखों से ओझल हो गइ। " पत्रकार पियुष कोई और नहीं शीला बुआ के पति थे पर, रजिया इस बात से अनभिज्ञ थी।
"किसी अज्ञात लड़की ने पुलिये से छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। मौका ए वारदात पर कपड़े मिले, शव का पता नहीं चल सका।"
सुबह के अखबार की हेडिंग पढ कर मोहल्ले के लोगों में दुख और रोष ब्याप्त था ।
तरह -तरह की बातें हो रही थी।
अर्धविक्षिप्त लड़की थी..घरवालों ने जाने हीं क्यूँ दिया ?
अम्मी, अब्बू ने घड़ियाली आंसू बहा अपने कर्तब्य का इति श्री किया ..
घर में कोई परेशान था ,तो वो थी सोहा। जिसने अम्मी की करतूत अपनी नजरों से देखा था।
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सोहा डरी-सहमी गुमसुम रहने लगी।
अम्मी ! अब रजिया दी कभी नहीं आएंगी?
मासूम सोहा ने पड़ोस के नेहा आंटी के सामने हीं पूछ दिया। "
चेहरे के भाव को छिपाते हुए अम्मी बोल पड़ी, अब वो अल्ला को प्यारी हो गई इसलिए अब वो नहीं आयेगी। "
अम्मी ! आपने रजिया दी को जहर क्यूँ पिलाया था, जब वो रो रही थी..?
अरे ! वो दवा थी न; दी को बुखार था इसलिए ..सकपकाते हुए अम्मी बोल पड़ी।
नेहा आंटी के चेहरे पर प्रश्नवाचक चिन्ह उभर आये। उन्होंने रजिया को अपनी बेटी छाया के साथ खेलने के लिए बाहर भेज दिया।
अब ये रोज की बात हो गई।
अम्मी आप मेरा बाल नहीं बनाओ..रजिया दी बनाएंगी।
अम्मी मैं रजिया दी के साथ सोउंगी ।
हर बात में रजिया दी का नाम लेना अम्मी के लिए मुश्किल बनता जा रहा था।
प्रायः वो पडोसियों के सामने भी बोल देती-"अम्मी आपने रजिया दी को क्यूँ मारा था ..? उस दिन रात में ...?
अरे ! बुद्धू मारा कहाँ था ? बुखार में थी रजिया दी, दवा पीने के लिए डांट रही थी मैं..।"
अम्मी की मुसीबत उस दिन और भी बढ़ गई, जब सोहा ने छाया से कहा--" मेरे घर नहीं आना कभी, अम्मी बुखार होने पर जहर पिला देंगी। "
फिर हम लोग कब खेलेंगे ?
मेरी मम्मी चाॅकलेट देंगी, तब हम दोनों खेलेंगे। छाया ने कहा !और दोनों खिलखिला कर हँस पड़ी।
अम्मी को सोहा का खौफ खाये जा रहा था ..सोहा अगर गांव रहेगी तो किसी- न -किसी दिन जेल भिजवा कर ही दम लेगी ..।" अम्मी ने सोहा को हाॅस्टल में रखने का निर्णय लिया।
जल्द ही सोहा शहर चली गई वहां हाॅस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करने लगी। अम्मी, अब्बू अक्सर मिलने आते..सोहा की हर जरूरत पूरी की जाती।
शायद सोहा के मन में कहीं न कहीं बहन के साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध भड़क रहा था। सोहा पढ़ाई में होनहार होने के साथ-साथ उदंडता की भी परिचायक थी। सोहा ने एल एल बी की पढ़ाई शुरू की .. स्वतंत्र विचारों की सोहा गांव पर भी देर रात तक घर आती..। प्रतिदिन उसके नये मित्र बनते, पार्टी का अरेंजमेंट सोहा को करना होता। अम्मी के वश में अब कुछ भी नहीं था।
उस दिन वज्रपात हुआ जब सोहा एक विजातीय लड़के से कोर्ट मैरिज कर के अम्मी का आशीर्वाद लेने आ गई। अम्मी शाक्ड रह गई। अम्मी के मन में उठते तूफानों को देख सोहा ने कहा-" अम्मी मैं बालिग हूं ..अपना फैसला कर सकती हूं .. । आप मुझे और सानू को स्वीकार करें और अपना आशीर्वाद दे। अम्मी- अब्बू बेटी के समक्ष परास्त हो गए। उन्हे डर था कि कहीं सोहा गड़े मुर्दे उखाड़ने लगी तो जीना दूभर हो जाएगा।
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रजिया चलते-चलते एक अनजान जगह पर आ गई। खुले आसमान के नीचे सोते रजिया का दिल धक-धक करने लगा। कोई विक्षिप्त समझ कुछ देता तो खा लेती, कभी मंदिर के भिखारीयो में बैठ जाती..। प्रायः रजिया सार्वजनिक स्थानों पर हीं रहती थी। कभी स्टेशन, प्लेटफार्म या मंदिर का प्रांगण..। अमुल्य धरोहर के तौर पर सुहाग की डिब्बी और पेट में पलता प्रिंस ..जिसे वो हर हाल में सुरक्षित रखना चाहती थी।
किसी तरह दिन कटते रहे ..एक दिन स्टेशन पर सोई रजिया को लगा कि कोई उसे फाॅलो कर रहा है। उसका दिल धक-धक करने लगा। अब उसे किसी औरत के संरक्षण की विशेष आवश्यकता थी,पर उसका था भी कौन ..?
ज्यों ही रजिया की आंख लगी, किसी चोर ने उसका बटुवा छीन लिया ,और भागने लगा। रजिया ने उसका पीछा किया और रेलवे ट्रैक पर हीं गिर पड़ी। वहीं उसे प्रसव पीड़ा होने लगी..रजिया के लिए ये पीड़ा उतनी भयंकर नहीं थी, जितनी पीड़ा उसे जिंदगी से मिल रही थी। रजिया कराहते स्वर में अपने सुहाग की डिब्बी मांगती रही। रजिया ने फिर साहस किया और आगे बढ़ी। उसकी सुहाग की डिब्बी फिर से गिरी हुई मिल गइ । रजिया चलती जा रही थी। असहनीय पीड़ा का अंत हुआ.. बच्चे को जन्म दे कर रजिया ने अपना पुनर्जन्म पा लिया..।
अब रजिया की चेतना जागृत हो गई थी ..वो अब विक्षिप्त नहीं थी। रेलवे के सहकर्मियों ने रजिया को अनाथ समझ उचित संरक्षण दिया।
रजिया ने पत्रकार पियुष को काॅल किया और आभार ब्यक्त किया।
पियुष सिर्फ बातों से संतुष्ट नहीं हुए वो रजिया से पता लिए और अपनी पत्नी शीला के साथ रजिया से मिलने आ गये।
रजिया को जीवित देख आज
शीला बुआ फिर से हैरत में पड़ गई।
रजिया ने बुआ के सभी संदेह को दूर किया। और पियुष फूफा जी के प्रति कृतज्ञता प्रकट की।
आप एक दूसरे को जानती हैं..? फूफा जी के पुछते हीं शीला बुआ
ने बीते दिनों के घटनाक्रम का पूरा विवरण सुना दिया।
अब तू अपने ससुराल चल रजिया.." शामू के माता' -पिता जो अब जीने की आश छोड़ चुके हैं। तु उनकी सांसे बन जा रजिया। शीला बुआ ने भावुकता से कहा!
जी बुआ! जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य अभी अधूरा है .. मुझे पहले अपने सुहाग का तर्पण करना है।
पियुष ने पुनः सहयोग का वादा किया ...और शीला बुआ के साथ अपने घर को चले गये।
प्रिंस को देख रजिया के चेहरे पर जो मुस्कान आई, उसने रजिया के सारे आंसुओं को समेट लिया। रजिया का वात्सल्य उमड़ पड़ा। उसने सूहाग की डिब्बी को सीने से लगाया और देर तक प्रिन्स के आने की खुशी ब्यक्त करती रही। प्रिंस के परवरिश में रजिया ने दिन-रात एक कर दिया। रजिया के अच्छे व्यवहार से सबका सहयोग मिलने लगा। रजिया यथासंभव मुहल्ले के सभी के बच्चों को नहलाना, खिलाना, व उचित देखभाल की जिम्मेदारी रखने लगी।
रजिया ने सभी का विश्वास जीत लिया। रजिया के लिए अब जीवन बोझ नहीं था .. अब रजिया का एक हीं लक्ष्य था" सुहाग का तर्पण "करना ।जिसके लिए रजिया ने वर्षो तक तपस्या की थी ।
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जब प्रिंस अठारह वर्ष का हो गया तब रजिया ने उसे अपनी पूरी सच्चाई बताई। एक बार फिर रजिया के आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। वो प्रिंस के साथ अपने गांव के लिए निकल पड़ी ।
उसने शीला बुआ से अपने गांव आने की खबर दी।
शीला बुआ ने श्याम के माता -पिता को बहू व पोते के आने की खबर दी। किसी को यकीन नहीं हो रहा था। एक बार फिर से पियुष फूफा जी ने रजिया के जीवित होने की खबर अखबार में फैला दी।
अखबार पढ़ते हीं सोहा उछल पड़ी और रजिया दी से मिलने निकल पड़ी।
सोहा
अब एक पेशेवर वकील थी पर उसने मां 'बाबूजी के लिए कोई पैरवी नहीं की। अपराध साबित होते हीं दोनों सलाखों के पीछे पहुंच गए। रजिया और सोहा गले मिल कर देर तक रोती रही। शामू के माता -पिता अपनी बहू और पोते को देख इश्वर का शुक्र अदा कर रहे थे ।
रजिया अपने बेटे प्रिंस के साथ गंगा के घाट पहुंच गई। सर्व प्रथम अपने सुहाग की डिब्बी का विसर्जन किया।
हाथ में जल ले कर आंखें बंद कर खड़ी हो गई। जल की लहरों में शामू का प्रतिबिंब दिखने लगा। रजिया की आंखे बरसने लगी।
मां-दादाजी बुला रहे हैं..।" उसने पीछे मुड़कर देखा पुरा गांव रजिया के स्वागत में खड़ा था ..।" पर उसकी नजरें अम्मी-अब्बू को ढूंढ रही थी ...। "
सोहा से सारी सच्चाई जानने के बाद उसने अम्मी- अब्बू को निर्दोष साबित किया और सजा की अवधि कम करवाई।
दूसरे दिन हीं रजिया के घर का नेम प्लेट चेंज था।
"रजिया श्याम सिंह "--देखते हीं उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई।
"एक जीत की मुस्कान। "
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समाप्त
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हंस दे मेरी रज्जो

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