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" हरीश बाबू कुसुम जी के जाने के बाद बिल्कुल तन्हा से हो गए थे। "
अभी कुसुम जी की आयु ही क्या थी? मात्र 40 बरस। परंतु एक सडक  दुर्घटना नेें उनकी जान ले ली । 
"कोई आस औलाद भी नहीं थी। धन-संपत्ति अताह, परंतु सदुपयोग अथवा उपभोग करने वाला कोई नहीं। "

"जीवन जीने का कोई सार्थक उद्देश्य तो कोई था नहीं। इसलिऐ हरीश बाबू अपने गम को भूलाए, दिन रात काम में मन लगाऐ रहते थे।"परंन्तु एक सवाल था कि, किसके लिऐ..!!

"इतना बडा कुसुम सदन और घर में वो उनके नौकर रामदीन और सुशीला काकी, बस तीन जन ही रहा करते थे।"

"बरसात की रात थी , घनघोर काली तभी अचानक से हरीश बाबू की नींद खुल गई। उन्हें लगा जैसे दरवाजे पर कोई बालक रो रहा है।" पहले अनदेखा किया । परन्तु फिर लगातार रोने की आवाजें आने लगी।

"हरीश बाबू ने आकर दरवाजा खोल कर देखा तो एक छोटा बालक जिसकी आयु 7-8माह रही होगी। दरवाजे पर रो रहा था।" 
उन्होने चारों तरफ देखा!!! आवाज लगाई!! किसका बच्चा है??कौन है?? परंतु कोई वहां होता तो, मिलता ना।
बच्चे को गोद में लेकर हरीश बाबू अंदर आ गए। सुबह होने तक इंतजार किया। उसके बाद " पुलिस को इत्तला किया गया। जब तक इसके मां-बाप का पता नहीं चलता। तब तक यह हरीश बाबू के पास ही रहेगा।" यह तय पाया गया । 

बच्चे को देख हरीश बाबू के मन में विचार और जीवन का सार्थक उद्देश्य नजर आया।

"सारी कार्यवाही जल्द से जल्द करते हुए कुसुम सदन को "कुसुम बाल आश्रम" में तब्दील कर दिया जायेगा।"

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शीतल शैलेन्द्र सिहं राघव
इन्दौर