साबन के सोमवार को शिव मंदिर में लंबी कतार लगी थी। विवाहित महिलाएं अपने सुहाग की उन्नति और बच्चों की तरक्की के लिये ब्रत रखतीं हैं तो अविवाहित कन्याएं अपने अनुकूल वर की चाहत में ब्रत रखती हैं। वैसे भगवान भोलेनाथ बहुत भोले बताये गये हैं। जल्द आराधना से खुश हो जाते हैं। पर मंदिर में लाइन में तो लगना ही पङता। भगवान को फल और दूध से संतुष्ट करने में कोई भी लङकी पीछे नहीं रहती।
राखी और विद्या दोनों पङोस में रहतीं थीं। दोनों ने साबन के सोमवार का ब्रत रखा। विद्या की माता नहीं थी। पिता रोज पङोस की लङकी राखी को मंदिर से जल्द लौटते देखते ओर विद्या को बहुत समय लग जाता। पिता को ज्यादा चिंता हो गयी। आखिर पङोस की लङकी जल्दी आ जाती है और विद्या को इतनी देर लगती है। कहीं बिटिया गलत रास्ते पर तो नहीं चल रही। वैसे लङकियों को माता ही संस्कारित करती है। पर वह तो विद्या के खुद पिता और माता दोनों थे। तो एक दिन चुपचाप विद्या के पीछे चल दिये। सचमुच बङी भीङ थी। लङकी को लाइन में लगे देखा तो मन का बहम खत्म हो गया। खुद के विचारों पर लज्जा भी आयी। लौटते में राखी आती दिखी। मंदिर के दरबाजे पर माथा टेक अपने साथ लाये फल और दूध भिखारी बच्चों को दे चली गयी।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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