संपूर्ण विधि विधान से राजकुमार विक्रांत और राजकुमारी विदिशा का विवाह हुआ। इस बार पहली बार किसी राजकुमार ने दहेज में दासियों को स्वीकार नहीं किया। उन दिनों राजकुमारियों के विवाह में दहेज में दासियों को भी दिया जाता था। ये दासियां पूरा जीवन उस राजकुमारी की सेवा में बिताती थीं। बड़े से बड़े धर्म प्राण राजाओं व राजकुमारियों के दासियों से संबंध की अनेकों कहानियाँ थीं। उस काल के इतिहास में अनेकों दासी पुत्र थे। पर चंपकपुरी के राजकुमार के लिये इन सबका क्या मोल। वे सभी दासियां अपनी इच्छानुसार जीवन जीने के लिये आजाद कर दी जायें, यही वचन राजकुमार ने दहेज में मांगा। 

   अनेकों सैनिकों की सुरक्षा में राजकुमारी चंपकपुरी के लिये विदा हुई। जैसे ही उसका चंपकपुरी की सीमा में प्रवेश हुआ उसे अपने छात्र जीवन की अनेकों यादें आने लगी। जब दोनों राजकुमारियां गुरुकुल में रहती थी तभी उनकी मित्रता कुवला नामक एक कन्या से हुई थी। चंपकपुरी के माहौल में राजकुमारी विदिशा को अपनी पुरानी सखी याद आ गयी। कुवला बहुत साहसी थी। हर बार वह प्रतिकूल परिस्थितियों में उनके साथ रही थी। राजकुमारी का मन अपनी सखी से मिलने को बैचैन हो रहा था। पर उसे कुबला के बारे में कुछ भी पता नहीं था। 

  राजकुमारी की पालकी राजमहल में पहुंचकर रुकी। राजकुमार विक्रांत उससे पूर्व ही महल में घुस चुका था। पर महल के भीतर से किसी ने उसे रोक दिया। भाई और बहन की रूठा मनी जैसी कुछ बात थी। राजकुमारी को याद आ रहा था कि जब उसका भाई भी विवाह कर वापस आया था तो उसने भी अपने भाई को बिना नेग लिये घर में घुसने नहीं दिया था। 

   थोड़ी देर में राजकुमार विक्रांत और उसकी छोटी बहन के मध्य कुछ समझोता हो गया। राजकुमारी विदिशा अपनी ननद को अपनी तरफ आता देख रही थी। पर नववधू होने के कारण सर झुका रखा था। 

  " अरे। तुम विदिशा।" 

  विदिशा की ननद जब पास आयी तो उसे देखकर चोंक गयी। राजकुमारी विदिशा को भी वह स्वर कुछ जाना पहचाना लगा। नजर उठाकर देखा तो सामने उसकी सखी कुवला खड़ी थी। 

  जिस तरह सोंधव राज्य की दोनों राजकुमारियां गुरुकुल में बहुत साधारण तरीके से रहती थीं, उसी तरह चंपकपुरी की राजकुमारी कुवला भी बहुत साधारण तरह से रहकर अध्ययन कर रही थी। आज अपनी सहेली को अपनी ननद के रूप में देखकर विदिशा को तथा अपनी सहेली को अपनी भाभी के रूप में देखकर कुवला को जो प्रसन्नता हुई, उसका बखान करना भी संभव नहीं है। 

   दोनों सखियों का रिश्ता भाभी और ननद से बढकर सगी बहनों जैसा हो गया। विदिशा का कोई भी रहस्य अब कुवला से अज्ञात न था। यह भी कि उसकी छोटी बहन प्रभावती भी राजकुमार सुधन्वा से प्रेम करती हैं। 

   इस तरह राजकुमार विक्रांत और राजकुमारी विदिशा की प्रेम की परिणति ने राजकुमार सुधन्वा और राजकुमारी प्रभावती की प्रीति के मार्ग खोल दिये। एक दिन दोनों का प्रेम भी मिलन के साथ पूर्ण हुआ। 

   राजकुमारी कुवला का विवाह चंपकपुरी के मुख्य सेनापति के पुत्र सुदर्शन के साथ हो गया। वैसे राजकुमारी होने के नाते उसका विवाह किसी राजकुमार से होना ही उचित था। पर महाराज हंसध्वज को अपनी पुत्री का विवाह राज्य के बाहर के किसी भी युवक से करना उचित न लगा। वैसे भी चंपकपुरी का साधारण युवक भी किसी अन्य राज्य के राजकुमार से कम नहीं होता था क्योंकि वह एकपत्नी व्रत का अनुयायी होता था। जबकि उस समय संसार में कोई भी राजकुमार इस नियम का पालन करने में अक्षम ही था। 

  छोटे राजकुमार सुधन्वा भगवान श्री कृष्ण के परमभक्त थे। भक्ति के संस्कार राजकुमारी प्रभावती में भी थे। पर सुधन्वा की संगति में उनमें निरंतर बृद्धि ही हुई। अनेकों वर्षों तक दोनों मित्रवत रहते रहे। एक दूसरे की आध्यात्मिक उन्नति के सहायक बने रहे। जबकि राजकुमार विक्रांत पिता बन चुके थे। 

   भविष्य के गर्भ में क्या निहित है, कहा नहीं जा सकता। आज तक जिस तरफ राजकुमार सुधन्वा और राजकुमारी प्रभावती का ध्यान ही नहीं है, अचानक वह कार्य इतना अनिवार्य हो सकता है कि उसमें एक दिन का विलंब भी स्वीकार्य न हो। 

   जीवन में हर बात का अपना एक महत्व है। किसी भी बात को अनिश्चित काल तक टालने का कितना बड़ा दुष्परिणाम हो सकता है तथा भगवान अपने भक्त का मान रखने के लिये क्या क्या नहीं करते हैं, अभी आगे की कहानी इन बातों का साक्षात उदाहरण हो सकती है। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'