तेज़ बारिश के बाद आसमान निखर गया था । ढलते सूर्य की किरणें जैसे पूरे आसमान को लाल नारंगी किए दे रही है । धरा को लगा की इस निखरी सी उजास के बीच बस कमी है तो सिर्फ एक इंद्र्धनुष की । वैसे भी यह कम ही दिखाई देता है, पर जब देता है तो अपने रंगों की सुंदरता और खुशियाँ चारों ओर बिखेर सा देता है । धरा अपनी बाल्कनी से घंटों आसमान ताकती रहती है । कब बिखरेंगे उसके जीवन में इंद्रधनुषी रंग । कभी बिखरेंगे भी या नहीं, यह सोच-सोच धरा बेचैन सी हो जाती है ।
" धरा कहाँ हो भई ? " ऋषभ ने पुकारा ।
" बाल्कनी में तो आओ, देखो कैसी स्वछ, निखरी हुई सी शाम हो आई है । लाल सुर्ख सूर्य जैसे आग का गोला बना बैठा है । देखो तो सही । " धरा ने कहा ।
" अरे नहीं, तुम ही प्रकृति का आनंद लो, मुझे कुछ काम है । बस एक प्याली चाय की दे दो । " ऋषभ का जवाब आया ।
" ठीक है बनाती हूँ । " , यह कह अनमने भाव से उठ कर धरा किचन की ओर बढ़ चली । चूल्हे पे चाय का पानी चढ़ाया । दूध, शक्कर, चाय पत्ती मिलाया और खौलने का इंतज़ार करने लगी । खौलती चाय के साथ धरा के मन में भी दसियों सवाल हदबदा रहे थे । क्यूँ ऋषभ मेरी बात नहीं मानता ? क्यों उसे मेरी तकलीफ़ का एहसास नहीं होता है ? किसी और के कहने का असर क्यों नहीं होता इस पर ? क्यों, क्यों और क्यों !! यह भी उसकी दुनिया बन गयी थी । इतने में देखा चाय तैयार हो गयी है । उसने चाय का कप ऋषभ को दिया । धरा चाहती थी कि वह फिर से ऋषभ से बात करे । फिर उसे समझने कि कोशिश करे, पर उसकी व्यस्तता देख, उसे वहीं छोड़, वह बाल्कनी में वापस आ गयी । क्या करे, क्या कहे, कैसे समझाए, वह हर वक़्त इसी उधेड़बुन में लगी रहती ।
शादी की शुरुआती दिनों में तो बस अभी क्या जल्दी है, थोड़ा समय एक दूसरे को दे यही सोच कर बच्चे कि बात को दोनों टालते रहे । समय-समय पर सासु माँ टोकती थी । माँ भी बच्चे की बात सोचने को कहती, पर इस जमाने में थोड़ा समय लेना कोई बड़ी बात भी नहीं । यही सोच कर किसी ने इतना ध्यान नहीं दिया ।
धीरे-धीरे समय कुछ ज़्यादा ही बीतने लगा । दो से तीन, तीन से पाँच और फिर पाँच से सात साल निकाल गए । अब तो धरा और ऋषभ भी चिंतित होने लगे थे । पर कहते हैं न कि ऐसे मामलों में खुद से ज़्यादा समाज को फ़िक्र हो जाती है । सो ढके-चुके शब्दों में ही सही, पर सबने पुछना शुरू किया ।
और साथ ही शुरू हुआ दौर डॉक्टरों का । बड़े-बड़े हॉस्पिटल, नामी-गिरामी डॉक्टर्स के कई चक्कर लगाए । पर सब जैसे इनके भाग्य के सामने नतमस्तक हो गए । ढेरों मन्नतें, आए दिन का व्रत-उपवास, कुछ काम न आ रहा था । इधर माँ कहती - " इसलिए कहा करती थी, इतनी देर न करो, जो देर करता है उसे कई बार ऐसी मुसीबतों का सामना करना पड़ जाता है । पर यहाँ मेरी सुनता कौन है ! " और उधर सासु माँ भी पोते-पोतियों के लिए पागल हुये जा रही थीं । इन सब के बीच धरा जैसे घुटी-घुटी सी, ज़िंदगी से निराश हो चली थी । मन में तो ममता की धार थी, पर किस पर लुटाए । कभी कहीं किसी बच्चे को देखती तो जी करता उसे उठा कलेजे से लगा ले । उसका मन भी बच्चे कि किलकारियों के लिए तरसता है । वह भी चाहती है कि अपने बच्चे को गोद में ले, उसके हर रोने पर रोये, उसके हंसने पे हँसे । उसके साथ दौड़े, खेले, खाए-खिलाए, और जैसे असंख्य माँ अपने बच्चों के साथ करती हैं, वही सब वह भी करे । दुख-पछतावे से उसकी आँखें नम हो गईं । पर सब कुछ जैसे बेकार सा लग रहा था । अब तो उसे अपनी सहेलियों के घर जाना अच्छा नहीं लगता । कारण जब सब मिलतीं तो बस अपने-अपने बच्चों कि ही बातें किया करतीं । उनके पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने से ले कर सोने-जागने का भी ज़िक्र होता और वह बस शांत चुप-चाप सब की बातें सुनती रहती ।
उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ था जब वह रेवा के घर गयी थी । रेवा ने यूं ही एक गेट-टुगेदर सा रखा था सभी सहेलियाँ वहाँ इकट्ठा हुई थीं । खूब बातें हुईं, मौज-मस्ती के बीच चाय-नाश्ता खूब चला और फिर बातों ही बातों में सबने बच्चों का ज़िक्र छेड़ दिया । और फिर से धरा चुप-चाप उदास सी हो गई । श्वेता बहुत देर से उसे देख रही थी । उसके हँसी के बीच भी उसकी उदासी साफ-साफ झलक रही थी । ऐसा लग रहा था जैसे वह भरी भीड़ में भी अकेली थी । उससे रहा न गया, वह पूछ बैठी - " धरा इतनी उदास क्यूँ हो ? कोई खास बात । "
" अरे कुछ नहीं बस यूं ही " धरा ने जवाब दिया ।
" ऐसे कैसे कुछ नहीं, धरा मैं सब जानती, समझती हूँ । बरसों से तुम्हारे साथ हूँ । पहचान जाती हूँ कि कौन सी बातें तुम्हें खुशी दे रही हैं और कौन सी परेशान कर रही हैं । वैसे बहुत दिनों से तुम्हें एक बात कहना चाह रही थी । धरा, तुम क्यूँ नहीं किसी डॉक्टर से कन्सल्ट कर या किसी अनाथ आश्रम से बच्चे को गोद ले लेती हो ? आज के समय में यह कोई अनहोनी बात नहीं है । " श्वेता ने उसका हाथ पकड़ बड़ी आत्मीयता से कहा ।
" तूने तो मेरे मन कि बात कह दी " धरा ने संयत लहज़े में कहा । " मैं भी बहुत दिनों से सोच रही हूँ, पर ऋषभ से कह नहीं पा रही हूँ, आज ज़रूर उससे बात करूंगी । थैंक्स श्वेता मेरी दुविधा को खत्म करने के लिए । " और फिर उसने खुशी मन से पूरी पार्टी के मज़े लिए ।
पर कहते हैं न गंभीर विषयों पर निर्णय लेना इतना आसान नहीं होता । या फिर आप कुछ सोचते हैं और विधाता ने कुछ और ही सोच रखा होता है । इसलिए जो दूसरे दिन धरा ने खाने की मेज़ पर कहा - " ऋषभ तुमसे एक बात करनी है । "
" हाँ, कहो न क्या बात है " ऋषभ ने पूछा ।
" ऋषभ हम कब तक किसी चमत्कार का इंतज़ार करते रहेंगे । मैंने जान, समझ और मान लिया है कि इस जन्म में तो मैं माँ नहीं बन सकती, तो क्यूँ का किसी बच्चे को गोद ले लेते हैं । "
" क्या ? " चिहुँक उठा ऋषभ । " किस बच्चे को ? किसी अनाथ को अपने घर ले आऊँ । नहीं धरा यह मुझसे नहीं होगा । "
" क्यों - क्यों नहीं हो पाएगा । हम घरों में पेट रखते हैं तो उनसे भी प्यार हो जाता है फिर यह तो इंसान होगा । उसे हम जितना प्यार देंगे हमें भी उतना ही मिलेगा । प्लीज़ ऋषभ, मान भी जाओ । हमारे भाग्य में शायद यही है । "
ऐसे ही कितने दिन, कितनी रातें ऋषभ को मनाने में बीत गए, पर उसकी ना, हाँ में न बदली । धरा का प्यार, गुस्सा, रोना और रुलाना सभी जैसे ऋषभ के तपते मन पर गिर भाप बन उड़ जा रहा था । ऋषभ जो उसे इतना प्यार करता है क्यों उसकी एक नहीं सुन रहा था । क्या उसकी खुशियाँ ऋषभ की नज़रों में कोई मायने नहीं रखतीं । इसी उधेड़बुन की बीच वह कई अस्पताल और कई अनाथ आश्रम भी गयी, श्वेता के साथ । सबको अपनी प्राथमिकता बताया और सभी ने आश्वाशन भी दिया कि " जब समय आएगा तो आपको फोन कर दिया जाएगा । "
परेशानी जैसे खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी । वह जानती थी कि परिवार से किसी बच्चे को गोद लेने कि सोचे तो शायद ऋषभ मान भी जाए । पर धरा ऐसा नहीं चाहती है । उसका विवेक कहता है - कि परिवार से कोई बच्चा क्यों, जब उसकी परवरिश, उसके देख-भाल करने को स्वयं उसके माता-पिता, उनका परिवार हो तो वहाँ मेरी क्या आवश्यकता है । धरा तो ऐसे बच्चे को लाना चाहती है जिसके लिए वह और सिर्फ वह ही उसकी माँ हो और ऋषभ तुम ही उसके पापा होगे । तब क्या वह हमारे प्रति ज़्यादा आसक्त न रहेगा ? पर ऋषभ कि समझ में ये सब नहीं आता था । वह तो बस कुल-खानदान, पाप-पुण्य कि रट लगाए रहता है । धरा तो समझा- समझा कर हार चुकी है ।
अचानक धरा का फोन बजा । उसने देखा डॉ. रोहित का फोन था । उसने झट फोन उठाया - " हैलो ! धरा बोल रही हूँ । " उधर से आवाज़ आई - " हाँ - धरा जी, आपके लिए एक खुशखबरी है । आपने जैसा कहा था वैसा ही एक नवजात अस्पताल में है । आप चाहें तो अभी आ कर मिल सकती हैं और यदि सही लगे और उसे अपनाना चाहें तो कल ही सारी कागज़ी कारवाई हो जाएगी । " धरा चुप थी, बिलकुल निशब्द हो गयी थी । " धरा, धरा जी आप सुन तो रही हैं न ? आपने कुछ कहा नहीं " - उधर से डॉ. रोहित कह रहे थे ।
" हाँ हाँ डॉक्टर साहब, मैं अभी आती हूँ । " किसी तरह काँपते शब्दों से उसने कहा और फोन रख दिया ।
आज शायद निर्णय की घड़ी आ गयी थी ।
उसके मन मे हज़ारों विचार चल रहे थे । ऋषभ क्या इसकी इज़ाजत देगा ? क्या वह अकेले सब कर पाएगी ? इसी सोच में डूबी धरा ने अपना पर्स उठाया और ऋषभ को बताया कि वह अस्पताल जा रही है, बच्चे को देखने । क्या वह उसके साथ चलेगा ?
ऋषभ ने फिर अपनी ना को ही चुना और धरा को भी समझाने कि कोशिश करने लगा । " धरा जल्दबाज़ी न करो । तुम मेरा फैसला तो जानती हो, और तुम भी वही करोगी जो मैं कहूँगा । "
पर आज शायद धरा ने ऋषभ की बात सुनी ही नहीं । हाथ छुड़ा बिना कुछ कहे वह घर से निकल गयी । ऋषभ का ना भी आज उसके लिए अर्थहीन सा हो गया था । उसने मन ही मन कहा - तुम साथ दो या न दो ऋषभ, मैंने तो बस बस निर्णय ले लिया है । और यह निर्णय धरा के व्यक्तित्व को एक संपूर्णता से भर गया ।
अब तुम्हारे हाँ का इंतज़ार नहीं है मुझे ऋषभ । क्योंकि तुम्हारे एक हाँ कि कीमत मेरे जीवन भर की खुशियाँ नहीं हो सकती ।
निर्णय की खुशी उसके मन को आह्लादित कर रही थी और जैसे उसी क्षण अपने बच्चे के कोमल उँगलियों का स्पर्श उसने अपने हथेलियों में किया
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता
पश्चिम बंगाल

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